एक नए अध्ययन से पता चलता है कि जो किशोर लड़कियां स्मार्टफोन, आईपैड या लैपटॉप पर बहुत अधिक समय बिताती हैं, उनमें नींद की समस्याओं के कारण अवसाद का खतरा बढ़ सकता है। इस नए स्वीडिश अध्ययन में कहा गया है कि इससे उनकी बहुत ज़रूरी नींद प्रभावित हो सकती है और उनमें अवसाद का जोखिम बढ़ता है।
शोधकर्ताओं ने पीएलओएस ग्लोबल पब्लिक हेल्थ पत्रिका में बताया कि जो किशोर लड़कियां स्क्रीन पर अधिक समय बिताती हैं, उनकी नींद की गुणवत्ता और अवधि खराब होती है।
अध्ययन के दौरान शोधकर्ताओं ने पाया कि स्क्रीन पर समय बिताने से किशोरों की रात की नींद बाधित होती है, जिससे उनके जागने और सोने के पैटर्न पर असर पड़ता है।
जिन किशोर लड़कियों ने बताया कि वे स्क्रीन पर लंबा समय बिताती हैं, उनमें समय के साथ नींद संबंधी विकार विकसित हो गए। ख़ास बात यह थी कि यह बदलाव लड़कियों में देखे गए।
परिणामों से यह भी पता चलता है कि यही निद्रा विकार (sleep disorder) लड़कियों में बाद में अवसादग्रस्तता (depressive symptoms) के लक्षणों से जुड़े हैं, हालाँकि लड़कों में ये परिणाम नहीं पाए गए।
अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने 12 से 16 वर्ष की आयु के 4,800 से अधिक स्वीडिश छात्रों को ट्रैक किया। एक वर्ष के दौरान तीन अलग-अलग बिंदुओं पर नींद, अवसाद के लक्षणों और स्क्रीन पर बिताए गए समय पर डेटा एकत्र किया।
शोधकर्ताओं ने बताया कि लड़कियों में अवसाद के लक्षण लड़कों की तुलना में दोगुने से भी ज़्यादा थे, यह एक लिंग अंतर है जो पहले के अध्ययनों में पाया गया है।
परिणामों से यह खुलासा भी हुआ कि लड़कियों के अवसाद के लक्षणों में से 38% से 57% के लिए स्क्रीन के उपयोग से प्रेरित नींद के पैटर्न को ज़िम्मेदार माना गया है।
हालाँकि, जो लड़के स्क्रीन पर ज़्यादा समय बिताते हैं, उन्हें भी नींद में व्यवधान का अनुभव होता है लेकिन ये बाद में अवसाद के लक्षणों से महत्वपूर्ण रूप से जुड़े नहीं थे।
इस शोध के हवाले से स्वीडन के कैरोलिंस्का इंस्टीट्यूट के डॉक्टरेट छात्र सेबेस्टियन हकबी ने कहा- “हमने पाया कि जिन किशोर लड़कियों ने स्क्रीन पर अधिक समय बिताने की बात कही, उनमें समय के साथ नींद संबंधी विकार विकसित हो गए।” परिणामस्वरूप, अवसाद के स्तर में वृद्धि देखी गई, ख़ास बात यह थी कि यह बदलाव लड़कियों में देखे गए।