आर्टेमिस-2 मिशन के साथ आधी सदी बाद एक बार फिर से चांद पर फोकस कर रहा है अमरीका

आधी सदी से पहले इंसान ने इतिहास रचा था और पहली बार चंद्रमा की सतह पर क़दम रखा था। अब नासा पहली अप्रैल को आर्टेमिस II मिशन पर चाँद की यात्रा करेगा। इस सफर में कमांडर रीड वाइसमैन, पायलट विक्टर ग्लोवर, क्रिस्टीना कोच और कनाडाई जेरेमी हैनसेन शामिल हैं।

नासा का आर्टेमिस-2 दस दिन का मिशन है। पहली अप्रैल को लॉन्चिंग के बाद यह मिशन 10 या 11 अप्रैल तक पृथ्वी पर लौट सकता है। इसके लिए शुक्रवार को यह सभी अंतरिक्ष यात्री ह्यूस्टन से T-38 जेट विमान से कैनेडी स्पेस सेंटर पहुंचे।इस मिशन के तहत ये अंतरिक्ष यात्री ओरियन अंतरिक्ष यान से चंद्रमा के चारों ओर दस दिन तक परिक्रमा करेंगे।

बताते चलें कि अपोलो के बाद यह पहली मानवयुक्त उड़ान होगी। इस उड़ान में स्पेस लॉन्च सिस्टम (SLS) रॉकेट की मदद से भविष्य के चंद्र आधारों और मंगल यात्रा के लिए आधार तैयार करेगी। गौरतलब है कि नासा के इस ऐतिहासिक आर्टेमिस II मिशन में अंतरिक्ष यात्री चांद पर नहीं उतरेंगे।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, नासा का आर्टेमिस-2 मिशन उनके आर्टेमिस कार्यक्रम की दूसरी निर्धारित उड़ान है। यह साल 1972 में अपोलो 17 के बाद से अब चंद्रमा के करीब जाने वाला पहला मानव मिशन है। इस सफर की बदौलत अंतरिक्ष में मौजूद हमारे सबसे नज़दीकी गृह की परिक्रमा अगली यात्राओं, चंद्रमा पर लैंड करने और वहां एक बेस बनाने का रास्ता आसान कर सकेंगी।

आर्टेमिस-1 मिशन को 2022 में लॉन्च किया गया था। उस समय यह चांद के चक्कर लगाने वाला मानवरहित मिशन था। इसके जरिए रॉकेट और स्पेसशिप के लिए अंतरिक्ष और चांद के करीब की स्थितियों की पड़ताल की गई थी।

आर्टेमिस-2 मानव मिशन की तैयारी उस मिशन के आधार पर ही की गई है। नासा के आर्टेमिस कार्यक्रम में इस मिशन पर हज़ारों लोग काम कर रहे हैं। इसके लिए कई वर्षों की मेहनत के साथ तक़रीबन 93 अरब डॉलर ख़र्च हो चुके हैं। बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, नेचुरल हिस्ट्री म्यूज़ियम की ग्रह वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर सारा रसेल का कहना हैं, ‘चांद में वही तत्व मौजूद हैं जो हमें धरती पर मिलते हैं।’

ऐसे में कयास लगाया जा रहा है कि चांद की ज़मीन सूखी, धूल भरी और बंजर ज़रूर लगती है मगर इसपर जीवन की उम्मीद भी है। और शायद यही कारण है कि अमरीका इतनी लागत, मेहनत और समय का निवेश कर रहा है।

वैसे तो चाँद पर कई दुर्लभ धातुएं मिली है जो धरती पर बहुत कम उपलब्ध हैं। इनमें लोहा और टाइटेनियम के अलावा हीलियम भी है। मगर सबसे बहुमूल्य संसाधन होने के नाते पानी ने वैज्ञानिकों को बहुत उम्मीदें दिलाई हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक़, रसेल का कहना हैं कि चांद के कुछ खनिजों में पानी फंसा हुआ है, साथ ही और ध्रुवों पर भी पानी की अच्छी ख़ासी मात्रा के होने भी वह बात करती हैं। उनके मुताबिक़, वहां ऐसे गड्ढे हैं जो हमेशा छाया में रहते हैं और जहां बर्फ़ जमा हो सकती है।

ऐसे में चांद पर रहने की कल्पना को साकार करने के लिए पानी तक पहुंच सबसे ज़रूरी है। दरअसल इस पानी से प्यास बुझाने के अलावा इसे ब्रेक करके हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का अस्तित्व संभव है और इस तरह से प्यास बुझाने के साथ साँस लेने का भी इंतिज़ाम हो सकेगा।

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