आखिर सस्ते पैकेटबंद खाने के बढ़ते चलन की वजह क्या है

भारत में खाद्य बाज़ार सस्ते खाद्य उत्पादों का एक बड़ा उपभोक्ता हैं। इसका कारण है वैश्विक औसत के मुक़ाबले में भारत में प्रति परिवार औसत आय काफी कम होना। यही कारण है कि दुनियाभर की कई बड़ी कंपनियों को एक ऐसा बड़ा बाजार मिल जाता है, जहां उनके ऊपर सख्त खाद्य मानकों को लागू करने का उतना दबाव नहीं होता, जितना कई अन्य देशों में होता है। भारत में ऐसे खाद्य पदार्थों उनके उपयोग और उसे होने वाले प्रभावों पर डीडब्ल्यू के यह रिपोर्ट बहुत कुछ बताती है।

रिपोर्ट के अनुसार, कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियां भारत में अपने उत्पादों को हल्की गुणवत्ता के साथ कम कीमत में बेचती हैं। प्रोसेस्ड फूड खाने से भारतीयों की सेहत पर असर हो रहा है और अब इसके खिलाफ आवाज भी उठने लगी है।

रिपोर्ट के अनुसार, भारत का पैकेज्ड फूड मार्केट साल 2025 में करीब 130 अरब डॉलर का था, जो 2026 में बढ़कर करीब 137 अरब डॉलर का हो गया है। हालाँकि भारत में अधिक चीनी, नमक और वसा वाले पैकेटबंद खाद्य उत्पादों पर चेतावनी वाले लेबल लगाने की तैयारी हो रही है साथ ही यह चर्चा भी हो रही है कि कई कंपनियां भारत में हल्की गुणवत्ता वाले सस्ते खाद्य उत्पाद बेचती हैं, जबकि दूसरे देशों में मिलने वाले उनके वही उत्पाद अच्छी गुणवत्ता के होते हैं।

यह बात भी रिपोर्ट के माध्यम से सामने आई है कि पैकेटबंद खाने से स्वास्थ्य पर होने वाले असर पर भी बात होने लगी है। गौरतलब है कि दुनियाभर में डायबिटीज के जितने मामले सामने आते हैं, उनमें से एक चौथाई अकेले भारत के होते हैं। डायबिटीज ड्रग बनाने वाली कंपनी नोवो नॉर्डिस्क के मुताबिक, भारत में 10 करोड़ से अधिक लोग डायबिटीज से जूझ रहे हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, पैकेटों में बिकने वाला प्रोसेस्ड फूड भी इसके लिए आंशिक रूप से जिम्मेदार है।

भारत में पैकेटबंद खाने का बाजार अभी भी तेजी से बढ़ रहा है। हालाँकि जागरूकता के हवाले से भी काम किया जा रहा है। ऐसे में महत्वपूर्ण यह है कि भारत के लोग पैकेटबंद खाने पर इतना निर्भरता बढ़ती ही जा रही है। इसका सबसे बड़ा कारण प्रति परिवार औसत आय का वैश्विक औसत से काफी कम होना है। यही कारण है कि कंपनियों को सख्त खाद्य मानकों की छूट के साथ यहाँ एक ऐसा बड़ा बाजार मिल जाता है।

रिपोर्ट बताती है कि देश में सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने कहा है कि वह ऐसे खाद्य पदार्थों पर सख्त चेतावनी वाले लाल लेबल लगा सकता है जिनमें चीनी, नमक या सैचुरेटेड फैट की मात्रा सरकार द्वारा निर्धारित सीमा से अधिक हो।

ऑल इंडिया फूड प्रोसेसर्स एसोसिएशन के हवाले से रिपोर्ट का कहना है कि प्रस्तावित लेबलिंग नियम के तहत भारत में 80 फीसदी पैकेटबंद खाद्य पदार्थों को चीनी, नमक या वसा की उच्च मात्रा वाले खाद्य पदार्थों के रूप में चिह्नित किया जा सकता है। वहीं, स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इससे आम लोगों में खाद्य पदार्थों के प्रति जागरुकता बढ़ेगी।

गौरतलब है कि साल 2016 में चिली में भी पैकेटबंद खाद्य उत्पादों पर वॉर्निंग लेबल छापने का कानून लाया गया था। रिसर्चरों के मुताबिक, इसके बाद चीनी वाले पेयों की बिक्री में करीब 24 फीसदी की गिरावट देखी गई। स्वास्थ्य विशेषज्ञ उम्मीद जता रहे हैं कि वॉर्निंग लेबल छपने की शुरुआत होने से भारत में भी लोगों की खान-पान की आदतें बेहतर होंगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *