विशेषज्ञ मच्छर भगाने वाली कॉइल के ख़तरनाक असर को लेकर चेतावनी देते हैं

सोने के समय अधिकतर घरों में मच्छर भागने के लिए अगरबत्ती का धुआं जलाते हैं। मगर कितने लोगों ने सोचा है कि मच्छरों से छुटकारा पाने के लिए जलाई गई अगरबत्ती का धुआं क्या इंसानी सेहत को नुकसान पहुंचाता है? इसका बच्चों, बुजुर्गों और सांस की बीमारी से जूझ रहे लोगों की सेहत पर क्या असर सकता है?

मच्छर भगाने का यह उपाय कितना कारगर है या फिर कई ज़हरीले रसायनों से भरी इस कॉइल को इस्तेमाल करने का सही तरीक़ा क्या है? जैसे मुद्दों पर बीबीसी की एक रिपोर्ट कई तथ्यों को उजागर करती है। रिपोर्ट के अनुसार ज़्यादातर लोग मच्छरों से बचने के लिए उपाय करते हैं। कोई स्प्रे का इस्तेमाल करता है तो कोई मच्छर भगाने वाली कॉइल जलाता है। लेकिन विशेषज्ञ इसके ख़तरनाक असर को लेकर चेतावनी देते हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक़, एक्सपर्ट का कहना है कि एक मच्छर भगाने वाली कॉइल का धुआं दर्जनों सिगरेट के धुएं के बराबर हो सकता है। इससे सांस और गले की समस्याएं पैदा हो सकती हैं और दमे का गंभीर दौरा भी पड़ सकता है।

इस रिपोर्ट में फेफड़ों, सांस संबंधी बीमारियों और एलर्जी के विशेषज्ञ डॉ. शाज़ली मंजूर का कहना है कि अगर मच्छर भगाने वाली कॉइल को किसी बंद जगह में जलाया जाए तो इससे गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं। उनके मुताबिक कॉइल का इस्तेमाल केवल खुली और हवादार जगह पर करना चाहिए। साथ ही इसे अपने से कम से कम 2 से 4 मीटर दूर रखना चाहिए।

बीबीसी उर्दू से बातचीत में डॉ. शाज़ली ने कहा, “बंद कमरे में कॉइल जलाना किसी ज़हर से कम नहीं है। कॉइल में मौजूद केमिकल्स की वजह से इसके जलने पर कई तरह के ज़हरीले पदार्थ निकलते हैं, जो बंद कमरे में जमा होकर इंसानों की सेहत के लिए ख़तरनाक साबित हो सकते हैं।”

उनके अनुसार, कई लोग खुले में खाना खाते समय या किसी बाहरी कार्यक्रम के दौरान अपने पास ही कॉइल जला लेते हैं। इससे भी शरीर नुक़सानदायक केमिकल्स के संपर्क में आ सकता है। ऐसे में कॉइल को मेज या कुर्सी के ठीक नीचे रखकर जलाना बेहतर माना गया है ताकि धुआं सीधे सांस के साथ शरीर में न जाए।

रिपोर्ट के अनुसार, एक्सपर्ट का मानना है कि अगर आप एक रात के लिए बंद कमरे या बंद जगह में मच्छर मारने वाली कॉइल जलाते हैं, तो इसका मतलब है कि आप 60 से 100 सिगरेट के बराबर धुआं अपने फेफड़ों में ले रहे हैं।

जानकारों का कहना है कि अलग-अलग कंपनियों की कॉइल में अलग-अलग रसायन हो सकते हैं, लेकिन आमतौर पर इनमें पाइरेथ्रिन, एलेथ्रिन, कार्बन मोनोऑक्साइड और बेंजीन जैसे रसायन पाए जाते हैं। इसके अलावा कॉइल बनाने में कई तरह के रंग और खुशबू वाले रसायनों का भी इस्तेमाल किया जाता है।

रिपोर्ट से पता चलता है कि अमरीकी नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक, एक मच्छर भगाने वाली कॉइल से निकलने वाले पीएम 2.5 कणों की मात्रा 75 से 137 सिगरेट जलाने के बराबर हो सकती है। वहीं, एक कॉइल जलाने से निकलने वाली फॉर्मल्डिहाइड की मात्रा 51 सिगरेट जलाने से पैदा होने वाली मात्रा के बराबर या उससे भी ज़्यादा हो सकती है।

ऐसे में रिपोर्ट यह सवाल भी सामने लाती है कि कॉइल के इस्तेमाल के बाद कमरे की हवा में फैलने वाले ये रसायन शरीर पर क्या असर डालते हैं? बीबीसी की 2025 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, कार्बन मोनोऑक्साइड (सीओ) गैस तब बनती है जब कोई जैविक पदार्थ पूरी तरह नहीं जलता। यह गैस खून में मौजूद हीमोग्लोबिन के साथ मिलकर शरीर तक ऑक्सीजन पहुंचाने की क्षमता को कम कर देती है। शरीर में इसकी थोड़ी मात्रा भी सिरदर्द, थकान और मतली जैसी समस्याएं पैदा कर सकती है, जबकि ज़्यादा मात्रा में यह जानलेवा साबित हो सकती है। इसके अलावा, सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड जैसी गैसें दिल, फेफड़ों और सांस की पहले से मौजूद बीमारियों को बढ़ा सकती हैं। ये फेफड़ों की प्राकृतिक सुरक्षा प्रणाली को भी कमज़ोर कर सकती हैं।

आगे रिपोर्ट में कहा गया है कि पीएम 2.5 और पीएम 10 जैसे सूक्ष्म कण, वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (वीओसी) और अन्य प्रदूषक नाक, गले और श्वसन तंत्र की परतों में जलन पैदा कर सकते हैं। इसके कारण खांसी, सांस लेने में परेशानी और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं। कॉइल के धुएं से दमा की समस्या बढ़ सकती है और सांस की नलियों से जुड़ी बीमारियों का ख़तरा भी बढ़ जाता है। जिन बच्चों को एलर्जी की परेशानी होती है, उन्हें रात में खांसी आ सकती है और दमे का दौरा भी पड़ सकता है।

शोधकर्ताओं ने इस पड़ताल में यह भी पाया कि बड़े कमरों में कॉइल की मच्छरों को मारने की क्षमता थोड़ी कम हो जाती है। वहीं कम हवादार कमरों में इसका असर अपेक्षाकृत ज्यादा देखा गया।

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