बदलते पर्यावरण का प्रभाव मानसून पर पड़ने से इसके पैटर्न में बड़ा बदलाव आया है। बारिश समय पर नहीं होने की वजह से किसी स्थान पर एक ही दिन में कई दिन के बराबर बारिश हो जाती है तो कहीं सूखा ही पड़ा रह जाता है।
बारिश के बदले चक्र और जलभराव के कारण डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया फैलाने वाले मच्छरों का प्रजनन बढ़ा है। भारत जैसे देशों में स्थिति और भी गंभीर है, जहाँ बढ़ते वायु प्रदूषण और अत्यधिक गर्मी के कारण आम लोगों का स्वास्थ्य लगातार प्रभावित हो रहा है। मॉनसून के दिनों में तापमान अधिक रहने से और बारिश का पानी भर जाने से डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियां फैलती हैं। ऐसे में लंबे समय तक सूखे के बाद रुक-रुक कर होने वाली बारिश मच्छरों के पनपने के लिए बेहतर माहौल देती हैं। नतीजे में डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियां फैलने लगती हैं।
बदले पर्यावरण के कारण स्वास्थ्य संबंधी समस्या इस समय एक बड़ा संकट बन गया है। इस माहौल में पनपने वाली बीमारियां हर साल और ज़्यादा विस्तार पा रही हैं। वही इसकी रोकथाम एक बड़ा मुद्दा है जो हर दिन कठिन होता जा रहा है। विश्व स्तर पर यह मानव जीवन के लिए सबसे बड़ा खतरा माना जा रहा है।
बीमारियों का संकट पांच साल से कम उम्र के बच्चों के लिए मुश्किल समय हो सकता है।दरअसल इन बच्चों का इम्यून सिस्टम अभी विकसित हो रहा होता है, ऐसे में उन्हें डायरिया, निमोनिया और मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों का खतरा ज्यादा होता है।
इसके अलावा रात के बढ़ते तापमान के कारण नींद की समस्या भी आम हो रही है। जलवायु परिवर्तन से जुड़ी आपदाओं, अत्यधिक गर्मी और अनिश्चित भविष्य के डर से तनाव और अवसाद जैसी मानसिक समस्याएं भी बढ़ रही हैं।
हमारे देश में कुपोषण एक बड़ी समस्या है। कुपोषित बच्चे में निमोनिया, डायरिया और खसरे जैसे संक्रमण का खतरा बहुत बढ़ जाता है। इसकी तुलना में एक स्वस्थ और टीका लगवा चुके बच्चे में इन बीमारियों से लड़ने की क्षमता कहीं बेहतर होती है। ऐसे में ज़रूरी है कि अपने आस-पास इस बात का ख्याल रखें कि बारिश या बाक़ी दिनों में भी मौसम की इन बीमारियों से बचा जा सके।