लखनऊ से करीब 24 लाख और गोंडा से 1.13 करोड़ की नकली दवाओं की खेप बरामद की गई है। इन नकली दवाओं के बड़े गिरोह का भंडाफोड़ एफएसडीए ने किया है।राजस्थान में बनने वाली ये दवाएं लखनऊ से बरामद हुई है। इस मामले में अमीनाबाद थाने में एफआईआर दर्ज करवाई गई है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (FSDA) की कार्रवाई में अमीनाबाद स्थित गोदाम से करीब 21 लाख रुपए और बक्शी का तालाब से करीब 3 लाख रुपए की संदिग्ध दवाएं बरामद की गई हैं। सील की गई इन दवाओं के कुल 31 दवा नमूने जांच के लिए राजकीय प्रयोगशाला भेजे गए हैं। इसकी लैब रिपोर्ट का इन्तिज़ार है। रिपोर्ट आने के बाद यह तय होगा कि दवाएं कैसी है।
दैनिक भास्कर की एक खबर के अनुसार,जांच में सामने आया है कि राजस्थान से दवाएं बनाकर उत्तर प्रदेश के कई जिलों में बिना बिल के सप्लाई की जा रही थीं। अब तक करीब 24 लाख रुपए की नकली दवाएं जब्त की जा चुकी हैं। इनमें ब्लड प्रेशर, एंटीबायोटिक, दर्द, एसिडिटी और एंटी-एंग्जायटी जैसी रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली दवाएं शामिल हैं। विभाग ने आठ आरोपियों के खिलाफ संगठित अपराध समेत कई धाराओं में एफआईआर दर्ज कराने की संस्तुति की है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, कर यह गिरोह गैस, बीपी, दर्द, सूजन और एंग्जायटी की नकली दवाओं के अलावा नकली एंटीबायोटिक्स की सप्लाई कर रहा था। एफएसडीए दस दिन पहले पड़ताल के दौरान अमीनाबाद के एक गोदाम में कई दवाओं के लेबल में प्रिंटिंग और स्पेलिंग की गड़बड़ी पाई थी। खबर के अनुसार, गोंडा कोतवाली में भी दो आरोपितों पर केस दर्ज किया गया है। अनुमान है कि इस नेटवर्क के तर बड़े अंतरराज्यीय गिरोह से जुड़े हैं।
खबर में विशेषज्ञों के हवाले से कहा गया है कि यदि दवाएं नकली या घटिया गुणवत्ता की होती हैं तो मरीज की बीमारी ठीक नहीं होती, बल्कि उसकी हालत और गंभीर हो सकती है। ब्लड प्रेशर की दवा असर न करने पर हार्ट अटैक या स्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है। नकली एंटीबायोटिक दवाएं संक्रमण बढ़ाने के साथ एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस पैदा कर सकती हैं। वहीं दर्द और एंग्जायटी की नकली दवाएं गंभीर दुष्प्रभाव पैदा कर सकती हैं।
जांच से यह भी पता चला है कि नेटवर्क का मुख्य स्रोत राजस्थान था। दवाएं यहाँ बनने के बाद निजी बसों और रोडवेज के जरिए लखनऊ सहित प्रयागराज, वाराणसी, गोंडा, सीतापुर समेत कई जिलों में भेजी जाती थीं। भुगतान फोन-पे और अन्य डिजिटल माध्यमों से किया जाता था। बिना बिल के कम कीमत पर खरीदकर इन्हें बाजार में अधिक मुनाफे पर बेचा जा रहा था।