विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, 1990 के बाद वयस्कों में मोटापे की दर दोगुनी से अधिक हो गई है, जबकि किशोरों में यह 4 गुना बढ़ चुका है। बीते दिन 4 मार्च को ‘विश्व मोटापा दिवस’ पर यह जानकारी सामने आई। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने आगाह किया है कि अगर कड़े क़दम नहीं उठाए गए, तो मोटापे से प्रभावित लोगों की संख्या, 2030 तक दोगुनी हो सकती है।

दुनिया भर में इस समय एक अरब से अधिक लोग मोटापे की अवस्था में जीवन गुज़ार रहे हैं, जिससे उनके हृदयवाहिनी रोग, डायबिटीज़, कैंसर, श्वसन व पाचन तंत्र समेत अन्य बीमारियों की चपेट में आने का जोखिम बढ़ जाता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने आगाह किया है कि अगर कड़े क़दम नहीं उठाए गए, तो मोटापे से स्वास्थ्य प्रणालियों पर भारी दबाव पड़ेगा, और प्रति वर्ष 3 हज़ार अरब डॉलर का आर्थिक नुक़सान उठाना पड़ सकता है।
गौरतलब है कि अधिक वजन और मोटापा तब होता है जब शरीर में अतिरिक्त वसा जमा हो जाए और ऊर्जा का सन्तुलन बिगड़ जाए। यानि, जितनी कैलोरी हम भोजन से लेते हैं, उसकी तुलना में कम ऊर्जा शारीरिक गतिविधियों में ख़र्च हो।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, मोटापा एक दीर्घकालिक बीमारी है जो बार-बार लौट सकती है। यह, केवल जीवनशैली का परिणाम नहीं है, बल्कि यह एक जटिल, दीर्घकालिक स्वास्थ्य स्थिति की वजह से भी होता है, जिसमें आनुवांशिक बनावट, पर्यावरणीय कारक, जैविकी और सामाजिक परिस्थितियाँ शामिल हैं।
पिछले दशकों में, भोजन की उपलब्धता, आर्थिक विकास, खान-पान और शारीरिक गतिविधियों में बदलाव, वैश्वीकरण और औद्योगिक खाद्य प्रणालियों के असर ने मोटापे को बढ़ावा दिया है। इसके अलावा कुछ लोगों में मोटापे के स्पष्ट कारण भी पाए जाते हैं, जैसे कुछ दवाइयाँ, बीमारियाँ, कम शारीरिक गतिविधियों की जीवनशैली या चिकित्सकीय प्रक्रियाएँ।
2024 तक, 5 वर्ष से कम उम्र के 3.5 करोड़ बच्चे अधिक वजन वाले पाए गए। वहीं, 5 से 19 वर्ष की आयु के 39 करोड़ से अधिक बच्चे और किशोर अधिक वजन वाले थे, जिनमें 16 करोड़ मोटापे से प्रभावित थे।














