बुज़ुर्ग नहीं बल्कि उनके प्रति समाज की प्रतिक्रिया चुनौती है- रिपोर्ट

संयुक्त राष्ट्र योरोपीय आर्थिकआयोग ने चेतावनी दी है कि “जनसांख्यिकीय टाइम बम” या “सिल्वर सुनामी” जैसे शब्द रूढ़िवादी धारणाओं को बढ़ावा देते हैं और समाज में उम्र बढ़ने से जुड़े मुद्दों पर सन्तुलित चर्चा को सीमित कर देते हैं।

हाल में जारी एक रिपोर्ट में बुज़ुर्गों को समाज पर बोझ के रूप में प्रस्तुत करने वाली सोच से बचने की अपील की गई है। दरअसल समाज में बढ़ती उम्र के बारे में प्रचलित धारणाएँ न केवल सार्वजनिक नीतियों को प्रभावित करती हैं, बल्कि लोगों की अपनी वृद्धावस्था के प्रति सोच को भी आकार देती हैं।

रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि आयु-आधारित भेदभाव, सभी आयु वर्गों को प्रभावित कर सकता है और पीढ़ियों के बीच भरोसे तथा एकजुटता को कमज़ोर कर सकता है।

संयुक्त राष्ट्र योरोपीय आर्थिक आयोग (UNECE) की रिपोर्ट से पता चलता है कि अनेक समाजों में, बढ़ती उम्र को अब भी शारीरिक और मानसिक गिरावट, दूसरों पर निर्भरता तथा सार्वजनिक जीवन से दूरी बनाने के साथ जोड़ा जाता है। इस प्रकार का नजरिया बुज़ुर्गों के प्रति सामाजिक रवैये, नीतियों और अवसरों को प्रभावित करती हैं। इतना ही नहीं, लोग खुद भी इन पूर्वाग्रहों को आत्मसात कर लेते हैं, जिससे उनके स्वास्थ्य, आत्मविश्वास और समग्र कल्याण पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।

सार्वजनिक धारणाओं की अहमियत
आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि उम्र बढ़ने के बारे में समाज में प्रचलित धारणाओं और चर्चाओं के दूरगामी प्रभाव पड़ते हैं। अनेक देशों में बढ़ती बुज़ुर्ग आबादी को अक्सर एक चुनौती, बोझ या सम्भावित संकट के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

इसके विपरीत, रिपोर्ट सन्तुलित, तथ्यों पर आधारित और सभी आयु वर्गों को शामिल करने वाली सोच को बढ़ावा देने का पक्ष लेती है, जो लम्बी आयु से जुड़े अवसरों और बुज़ुर्गों की विविधता को भी मान्यता दे।

रिपोर्ट में विभिन्न देशों के ऐसे उदाहरण भी दिए गए हैं जहाँ उम्र बढ़ने को अधिक सकारात्मक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने के प्रयास किए गए हैं, साथ ही नीति-निर्माताओं के लिए व्यावहारिक सुझाव भी पेश किए गए हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि बढ़ती उम्र को केवल निर्भरता और बोझ के रूप में देखना वास्तविकता को पूरी तरह नहीं दर्शाता है। वर्तमान में लाखों बुज़ुर्ग कामकाज, स्वयंसेवा, परिवार की देखभाल और सामुदायिक गतिविधियों में सक्रिय योगदान दे रहे हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, लम्बी और स्वस्थ आयु को आर्थिक अवसर के रूप में भी देखा जाना चाहिए। योरोपीय संघ में ही 55 से 64 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 4.1 करोड़ लोग श्रम बाज़ार में सक्रिय हैं और पिछले दशक में उनकी भागेदारी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। हालाँकि, पेंशन, स्वास्थ्य सेवाओं और सरकारी ख़र्चों पर दबाव जैसी चिन्ताओं पर केन्द्रित चर्चाएँ अक्सर बुज़ुर्गों की सकारात्मक भूमिका को पीछे छोड़ देती हैं।

सकारात्मक सोच पर बल
रिपोर्ट में कहा गया है कि उम्र से जुड़ी रूढ़िवादी धारणाएँ लोगों के स्वास्थ्य, कल्याण और सामाजिक भागेदारी पर वास्तविक असर डाल सकती हैं.

उम्र बढ़ने के बारे में समाज की सोच बदलना केवल संचार का मुद्दा नहीं, बल्कि आयु-आधारित भेदभाव (ageism ) से निपटने और सभी आयु वर्गों की भागेदारी बढ़ाने के लिए आवश्यक है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि चुनौती बढ़ती उम्र नहीं, बल्कि उसके प्रति समाज की प्रतिक्रिया है। यदि उम्र बढ़ने को संकट या बोझ के बजाय एक साझा उपलब्धि और अवसर के रूप में देखा जाए, तो पीढ़ियों के बीच एकजुटता मज़बूत होगी और बेहतर नीतियाँ विकसित की जा सकेंगी।

आयोग ने इसके मद्देनज़र देशों की सरकारों से बुज़ुर्गों को निर्णय-निर्माण में शामिल करने, उनके विविध अनुभवों को सामने लाने और उम्र बढ़ने से जुड़ी सकारात्मक सोच को नीतिगत उपायों के साथ बढ़ावा देने की अपील की है।

यह संदेश संयुक्त राष्ट्र के UN Decade of Healthy Ageing के उद्देश्यों के अनुरूप है, जिसका लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि हर व्यक्ति को स्वस्थ और सक्रिय जीवन जीने का अवसर मिले।

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