केजीएमयू यानी किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग में द्वारा किया जाने वाला एक अध्ययन बीमारी को लेकर विवाह की धारणा पर प्रकाश डालता है।

ट्यूबरक्लोसिस की बीमारी झेल रही महिलाओं पर हुए अध्ययन में कुछ ऐसी ही बातें सामने निकल कर आई हैं। प्राप्त तथ्यों के अनुसार, टीबी के कारण 10 फीसदी महिलाओं के विवाह तलाक में बदल रहे हैं जबकि 40 फीसदी युवतियां शादी लायक नहीं समझी जा रहीं। इसका नकारात्मक पहलू यह निकलता है कि जागरुकता कार्यक्रम भी ट्यूबरक्लोसिस (टीबी) बीमारी के प्रति सामाजिक धारणा में बदलाव नहीं ला पा रहे हैं।
लखनऊ मेडिकल कॉलेज में होने वाला यह अध्ययन डॉक्टर ज्योति बाजपेयी, डॉक्टर कंचन श्रीवास्तव, डॉक्टर शुभजीत रॉय, डॉक्टर सूर्यकांत और डॉक्टर अपूर्व नारायण ने किया है।
अध्ययन में जिन 960 महिला टीबी रोगियों को शामिल किया गया उनकी आयु 18 से 55 वर्ष के बीच थी। इस तरह शोध में शामिल लोगों की औसत आयु 39 वर्ष थी। इसमें दो तिहाई की उम्र 45 वर्ष से कम थी जबकि 70 फीसदी की बीमारी तीन महीने से कम और बाकी की इससे ज्यादा समय से थी।
अध्ययन में प्राप्त नतीजों से जो निष्कर्ष सामने आया वह इस प्रकार है-
- 50 प्रतिशत महिलाओं को अपनी बीमारी के खुलासे का डर था।
- 44 प्रतिशत की सामाजिक गतिविधि कम हो गई।
- 40 प्रतिशत युवतियों को शादी के लायक नहीं समझा गया।
- 10 प्रतिशत का विवाह तलाक में बदल गया।
- 25 प्रतिशत को घर में ही भेदभाव का सामना करना पड़ा।
- 18 प्रतिशत युवतियों के पति ने ही उपेक्षा की।
हालाँकि इलाज और जागरूकता अभियान के ज़रिये इन परिस्थितियों को बदला जा सकता है। यदि किसी को भी ऐसे लक्षण का एहसास हो जिसमें लंबे समय से खांसी, छाती में दर्द, खांसी में खून आना, थकान, बुखार, रात को पसीना आना, वजन कम होना, भूख में कमी आदि होने पर तुरंत जाँच कराएं।
ध्यान रखें कि ‘टीबी कोई लाइलाज बीमारी नहीं है। राष्ट्रीय क्षय नियंत्रण कार्यक्रम के तहत इसका निशुल्क इलाज किया जाता है। इसलिए इससे डरने या परेशान होने की जरूरत नहीं है। बेहतर इलाज से इसे पूरी तरह काबू किया जा सकता है।













