सिगरेट पीने की आदत से न केवल फेफड़ों, बल्कि दिमाग पर भी असर पड़ता है जिससे याददाश्त और सोचने की शक्ति कम हो रही है।
हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि स्मोकिंग से डिमेंशिया यानि दिमागी कमजोरी का खतरा बढ़ता है। इसका कारण बताते हुए वह कहते हैं कि ऐसा इसलिए है क्योंकि फेफड़े सीधे मस्तिष्क से जुड़े होते हैं।
अमरीका में शिकागो यूनिवर्सिटी में हाल ही में हुई एक स्टडी के मुताबिक, निकोटीन एक नया बायोलॉजिकल रास्ता एक्टिवेट कर सकता है जो इस कनेक्शन को समझने में मदद करता है। पिछली रिसर्च से पता चला है कि मिडिल एज में बहुत ज़्यादा स्मोकिंग करने वालों को दशकों बाद अल्जाइमर बीमारी सहित डिमेंशिया का खतरा दोगुना से भी ज़्यादा हो जाता है।
शोध में पाया गया है कि धूम्रपान करने वालों में डिमेंशिया होने की संभावना 30- 50 प्रतिशत अधिक होती है। वहीँ वर्तमान धूम्रपान करने वालों में अल्ज़ाइमर रोग का खतरा 40 प्रतिशत से अधिक बढ़ सकता है। हर दिन 20 सिगरे पीने से डिमेंशिया का खतरा 34% तक बढ़ सकता है, जो सीधे तौर पर तंबाकू की मात्रा से जुड़ा है।
स्टडी के दौरान, साइंटिस्ट्स ने पाया कि फेफड़ों में खास सेल्स, जिन्हें पल्मोनरी न्यूरोएंडोक्राइन सेल्स कहते हैं, निकोटीन के जवाब में एक्सोसोम नाम के छोटे पार्टिकल्स छोड़ते हैं और वे दिमाग में आयरन बैलेंस को कंट्रोल करने के प्रोसेस में रुकावट डालते हैं, जो हेल्दी नर्व सेल्स के लिए ज़रूरी है।
नतीजतन, आयरन का असंतुलन न्यूरॉन्स (नर्व सेल्स) को नुकसान पहुंचा सकता है, उनके एनर्जी सिस्टम पर दबाव डाल सकता है और ऐसे प्रोसेस को ट्रिगर कर सकता है जो अल्जाइमर और पार्किंसंस जैसी न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों से जुड़े हैं।
इस अध्ययन के को-ऑथर और पोस्टडॉक्टरल रिसर्चर कुई झांग के अनुसार, स्टडी में फेफड़े-दिमाग के बीच एक साफ कनेक्शन दिखाया गया है, जिससे यह समझा जा सकता है कि स्मोकिंग का मानसिक गिरावट से क्या संबंध है।
मेडिकल जर्नल साइंस एडवांसेज में छपी यह स्टडी, लैब मॉडल और स्टेम सेल से बने PNECs पर आधारित थी। हालांकि नतीजे उत्साह बढ़ाने वाले हैं, लेकिन रिसर्चर्स ने चेतावनी दी है कि इंसानों में इस मैकेनिज्म को कन्फर्म करने के लिए और रिसर्च की ज़रूरत है।