कागज़ों पर सैकड़ों करोड़ का चंदा वसूलने वाली सियासी पार्टिया: रिपोर्ट

बीबीसी ने खोजी पत्रकारिता के तहत ऐसी छह पार्टियों की पड़ताल की है जिन्हें 2024 के आम चुनाव से पहले सबसे अधिक चंदा मिला है। यह पड़ताल दिखाती है कि सैकड़ों करोड़ का चंदा पाने वाली इन पार्टियों के आर्थिक लेन-देन और राजनीतिक गतिविधियों में कोई समानता नहीं है। साथ ही उनकी गतिविधियों और परदे के पीछे से काम करने वाले लोगों के मामले में पारदर्शिता की कमी भी साफ़ नज़र देखी गई।

इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 2,800 से ज़्यादा राजनीतिक पार्टियां हैं, लेकिन इनमें से सिर्फ़ 73 को ही भारत के चुनाव आयोग ने राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय पार्टी के तौर पर मान्यता दी है। बाकी सभी आरयूपीपी हैं।

बीबीसी की यह पड़ताल जून में उस समय शुरू हुई जब तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसद पार्टी छोड़कर नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में शामिल हो गए थे। एनसीपीआई भी एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टी (आरयूपीपी) है।

के दौरान उन छह पार्टियों की पड़ताल की गई जिन्हें 2024 के आम चुनाव से पहले सबसे अधिक चंदा मिला है, इस सूची में एनसीपीआई शामिल नहीं है। यह पड़ताल दिखाती है कि सैकड़ों करोड़ का चंदा पाने वाली इन पार्टियों के आर्थिक लेन-देन और राजनीतिक गतिविधियों में कोई समानता नहीं है। लेकिन नतीजों और विशेषज्ञों की ओर से किए गए उनके विश्लेषण से इन पार्टियों के कामकाज पर सवाल उठते हैं।

उदाहरण के लिए साल 2023-24 में इन पार्टियों की कुल आय, सत्ताधारी बीजेपी को छोड़कर बाकी पांच राष्ट्रीय पार्टियों की आय से ज़्यादा है। फिर भी, चुनाव आयोग के आंकड़ों से पता चलता है कि सबसे अमीर छह गैर-मान्यता प्राप्त पंजीकृत राजनीतिक दलों ने साल 2024 के लोकसभा चुनावों में सिर्फ़ 15 उम्मीदवार उतारे थे जबकि बीजेपी के अलावा बाकी पांच पार्टियों ने 893 उम्मीदवार खड़े किए। यहाँ हैरान करने वाली बात यह है कि आम जनमत पार्टी, जिसे छह आरयूपीपी में सबसे ज़्यादा चंदा मिला था, ने चुनाव में सिर्फ़ एक उम्मीदवार उतारा था।

चुनाव आयोग में दी गई जानकारी के अनुसार, साल 2020 में पटना में पार्टी के बनने के बाद दो साल तक उसे 20,000 रुपये से ज़्यादा का कोई चंदा नहीं मिला। राजनीतिक पार्टियों के लिए यह ज़रूरी है कि वे 20,000 रुपये से ज़्यादा के सभी चंदों की सालाना रिपोर्ट चुनाव आयोग को सौंपें। लेकिन साल 2022-23 में आम जनमत पार्टी को 216 करोड़ रुपये मिले और फिर साल 2023-24 में चंदा बढ़कर 620 करोड़ रुपये हो गया।

मज़ेदार बात यह है कि फ़ोन पर बातचीत में पार्टी के कोषाध्यक्ष धर्मेंद्र वैष्णव ने दावा किया कि उन्होंने कामकाज बंद कर दिया था, जबकि बीबीसी की टीम उनके बैंक खाते में अभी भी चंदा भेज सकती थी। पार्टी के फ़ाइनेंस के बारे में और पूछताछ करने पर, वैष्णव ने बताया कि उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं है और सभी सवाल गौरव मिश्रा से पूछने की बात कही।

पड़ताल से यह बात भी सामने आई कि बीबीसी ने पार्टी की फांउडिंग अध्यक्ष अनामिका पासवान से बात की। वर्तमान में अनामिका पटना में बीजेपी की प्रदेश उपाध्यक्ष हैं। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने साल 2022 में आम जनमत पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया था। उनके पति ने उनका इस्तीफ़ा पत्र और एक दस्तावेज़ दिखाया, जिसमें कहा गया था कि पार्टी अपना बेस पटना से अहमदाबाद ले गई है और फिलहाल गौरव मिश्रा इसके अध्यक्ष हैं।

कुछ ऐसा ही मामला ‘गरीब कल्याण पार्टी’ का भी रहा, जिसे चंदे के तौर पर 138 करोड़ रुपये मिले थे और जिसने तीन उम्मीदवार मैदान में उतारे। इस पार्टी का दफ़्तर अहमदाबाद के नरोदा इलाके में ‘आम जनमत पार्टी’ के दफ़्तर के पास ही है। गरीब कल्याण पार्टी का ऑफ़िस भी बंद था। पार्टी के अध्यक्ष नीरज कुमार क्षत्रिय के घर पर उनकी मां आशा बेन ने बीबीसी को बताया कि वे घर पर नहीं हैं और उन्हें पार्टी के कामकाज के बारे में कोई जानकारी नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि छह आरयूपीपी में से चार के रजिस्टर्ड ऑफिस एक ही इलाके में हैं। बाकी दो भी गुजरात में ही हैं।

रिपोर्ट के मुतबिक, चुनाव पर नजर रखने वाली संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की रिसर्चर शैली महाजन आरयूपीपी की आय का अध्ययन करती हैं।उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया कि इनमें से कई पार्टियां अक्सर “मनी लॉन्ड्रिंग और टैक्स चोरी के एक जरिए” के तौर पर काम करती हैं।

उन्होंने सवाल किया, ‘ये पार्टियां चुनावी तौर पर सक्रिय नहीं हैं, फिर भी इन्हें इतना बड़ा फंड मिल रहा है और ये पैसे खर्च भी कर रही हैं। तो, सवाल यह उठता है कि क्या ये सच में राजनीतिक पार्टियां हैं, या ये शेल कंपनियों के लिए एक मोहरे के तौर पर काम कर रही हैं ताकि वे अपने पैसे को लॉन्डर कर सकें?’

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