स्टडीज़ में पाया गया है कि ज़्यादा चीनी और आर्टिफ़िशियली मीठे ड्रिंक्स का संबंध मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम्स और डिप्रेशन के बढ़ते लक्षणों से है।
स्टडी के अनुसार, जो लोग ज़्यादा कॉफी पीते हैं, उनमें डिप्रेशन के लक्षण होने की संभावना कम होती है। वहीँ जो लोग मीठे और आर्टिफिशियली मीठे ड्रिंक्स पीते हैं, उनकी मेंटल हेल्थ के नतीजे तुलनात्मक रूप से उतने बेहतर नहीं होते हैं।
पिछले दिनों में मेडिकल जर्नल डिप्रेशन एंड एंग्जायटी में छपी इस रिपोर्ट में 22 देशों में 2 मिलियन से ज़्यादा लोगों पर की गई 59 स्टडीज़ का रिव्यू किया गया। रिसर्चर्स ने पाया कि जो लोग कम या बिल्कुल कॉफी नहीं पीते थे, उनकी तुलना ज़्यादा कॉफी पीने वालों में डिप्रेशन के लक्षणों का खतरा 13 प्रतिशत कम था। हालांकि, एक्सपर्ट्स ने चेतावनी दी है कि इन नतीजों से यह साबित नहीं होता कि कॉफी पीने से डिप्रेशन से बचाव होता है या यह ठीक होता है।
मीठे ड्रिंक्स मूड पर कैसे असर डाल सकते हैं
कई स्टडीज़ में पाया गया है कि ज़्यादा चीनी और आर्टिफ़िशियली मीठे ड्रिंक्स का संबंध मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम्स और डिप्रेशन के बढ़ते लक्षणों से है।न्यूट्रिशन एक्सपर्ट्स के अनुसार, ज़्यादा चीनी खाने से शरीर में इन्फ्लेमेशन बढ़ सकता है, जो दिमाग के उन हिस्सों पर असर डाल सकता है जो एंग्जायटी और स्ट्रेस रिस्पॉन्स में भूमिका निभाते हैं।
ज़्यादा चीनी ब्लड ग्लूकोज़ लेवल में उतार-चढ़ाव भी ला सकती है और इंसुलिन रेजिस्टेंस पैदा कर सकती है। यह ब्रेन-डिराइव्ड न्यूरोट्रॉफ़िक फ़ैक्टर (BDNF) के लेवल और दिमाग की कोशिकाओं के बीच कनेक्शन पर असर डाल सकता है।
बीडीएनएफ दिमाग की कोशिकाओं के विकास और रखरखाव में अहम भूमिका निभाता है, और कम लेवल को डिप्रेशन के बढ़ते खतरे से जोड़ा गया है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि ज़्यादा चीनी खाने से शरीर का नॉर्मल कोर्टिसोल सिस्टम भी खराब हो सकता है। इसी तरह, ज़्यादा चीनी और ज़्यादा ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले खाने को शरीर में इन्फ्लेमेशन और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से जोड़ा गया है।
मेंटल हेल्थ के लिए कितनी चीनी सेफ़ है
अभी, एक्सपर्ट्स यह तय नहीं कर पाए हैं कि मेंटल हेल्थ के मामले में हर व्यक्ति के लिए कितनी मात्रा सुरक्षित मानी जा सकती है। जो सबूत मौजूद हैं, उनमें ज़्यादातर ऑब्ज़र्वेशनल स्टडीज़ हैं, इसलिए यह तय करना मुश्किल है कि ज़्यादा चीनी खाने से मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम्स बढ़ती हैं या जो लोग पहले से ही डिप्रेशन और एंग्जायटी से परेशान हैं, वे ज़्यादा मीठे खाने और ड्रिंक्स पीते हैं।
एक स्टडी में पाया गया कि जो युवा लोग सॉफ्ट ड्रिंक्स के ज़रिए हर दिन 25 ग्राम से ज़्यादा चीनी लेते हैं, उनमें एंग्जायटी और डिप्रेशन के लक्षण ज़्यादा थे, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर दिन 25 ग्राम या उससे कम चीनी निश्चित रूप से मेंटल हेल्थ के लिए एक सुरक्षित लिमिट है।
क्या शुगर-फ़्री ड्रिंक्स बेहतर ऑप्शन हैं
चीनी की जगह आर्टिफ़िशियल स्वीटनर डालने से कोई ड्रिंक मेंटल हेल्थ के लिए बेहतर नहीं हो जाती। रिव्यू में आर्टिफ़िशियली मीठे ड्रिंक्स और डिप्रेशन के ज़्यादा रिस्क के बीच एक लिंक पाया गया, जैसा कि मीठे ड्रिंक्स, सॉफ्ट ड्रिंक्स, बबल टी और एनर्जी ड्रिंक्स के लिए भी ऐसा ही लिंक मिला। तो, सिर्फ़ इसलिए कि किसी ड्रिंक पर ‘शुगर-फ़्री’ का लेबल लगा है, इसका मतलब यह नहीं है कि वह अपने आप मेंटल हेल्थ के लिए एक हेल्दी चॉइस बन जाती है।
कॉफ़ी और डिप्रेशन के बीच कनेक्शन
पिछली स्टडीज़ में भी कॉफ़ी पीने को डिप्रेशन के कम रेट से जोड़ा गया है। एक पिछली स्टडी में पाया गया कि जो महिलाएँ दिन में चार कप कॉफ़ी पीती हैं, उनमें डिप्रेशन का रिस्क लगभग 20 परसेंट कम होता है, जबकि लेटेस्ट रिव्यू में भी ज़्यादा कॉफ़ी पीने और डिप्रेशन के कम लक्षणों के बीच एक लिंक पाया गया है।
कंट्रोल ज़रूरी है
मेंटल हेल्थ कई फ़ैक्टर्स से प्रभावित होती है, जिसमें जेनेटिक फ़ैक्टर्स, लाइफ़स्टाइल, नींद, फ़िज़िकल एक्टिविटी, डाइट और सोशल और एनवायर्नमेंटल फ़ैक्टर्स शामिल हैं।इसीलिए एक्सपर्ट्स किसी एक ड्रिंक को खराब मेंटल हेल्थ का अकेला कारण मानने की सलाह नहीं देते हैं, और न ही वे इसे डिप्रेशन का इलाज मानने का सपोर्ट करते हैं।
मौजूदा सबूत बताते हैं कि सादी, कम चीनी वाली या बिना चीनी वाली कॉफ़ी पीने से डिप्रेशन के लक्षण कम हो सकते हैं, जबकि ज़्यादा मीठे ड्रिंक्स पीने से मेंटल हेल्थ पर काफ़ी बुरे नतीजे हो सकते हैं।