केंद्र सरकार द्वारा 15 अक्टूबर से व्यापारियों पर लगाए जाने वाले 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई भुगतान पर 0.4 फीसदी शुल्क का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया है। याचिका में भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 की संशोधित धारा 10ए की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है।
रिपोर्ट के मुताबिक़, आरबीआई एवं केंद्र सरकार से स्वतंत्र समीक्षा कराने का भी आग्रह किया गया है। याचिकाकर्ता ने अदालत से 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई लेनदेन पर एमडीआर लगाने वाली व्यवस्था को स्थगित या रेड करने का की गुज़ारिश की है। साथ ही इस व्यवस्था पर पुनर्विचार की अपील भी की गई है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, याचिका में कहा गया है कि बिना पारदर्शिता और सार्वजनिक परामर्श के यूपीआई पेमेंट पर शुल्क लगाया गया है। शीर्ष अदालत में दायर जनहित याचिका में इस शुल्क को पर्याप्त कानूनी सुरक्षा उपायों, पारदर्शिता और सार्वजनिक परामर्श के बिना लागू किया जाने वाला कहा गया है। गौरतलब है कि केंद्र सर्कार द्वारा 2,000 रुपये तक के यूपीआई लेनदेन पर कोई एमडीआर शुल्क नहीं लगेगा। यह शुल्क व्यापारियों को देना होगा।
बीते दिन पहले केंद्र सरकार ने 15 अक्टूबर से व्यापारियों को किए जाने वाले 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई भुगतान पर 0.4 प्रतिशत शुल्क लागू किया है। इसके तहत 2,000 रुपये से अधिक के व्यक्ति-से-व्यापारी (पी2एम) यूपीआई लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर लगाया जाएगा।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, दायर पीआईएल में अधिवक्ता अंजन दत्ता ने केंद्र सरकार की 14 सितंबर की अधिसूचना और 15 सितंबर को घोषित एमडीआर व्यवस्था को चुनौती दी गई है। यह व्यवस्था 15 अक्टूबर से लागू होने वाली है। याचिका के अनुसार, नयी व्यवस्था में 2,000 रुपये से अधिक के सामान्य पी2एम यूपीआई लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर का प्रावधान है। इसके साथ ही 75,000 रुपये या उससे अधिक के लेनदेन के लिए इसकी अधिकतम सीमा 300 रुपये तय की गई है।
रिपोर्ट्स यह भी बताती हैं कि, याचिका में भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 की संशोधित धारा 10ए की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। इसमें कहा गया है कि यह प्रावधान कार्यपालिका को बिना स्पष्ट दिशानिर्देश के यह अधिकार देता है कि कौन सा इलेक्ट्रॉनिक भुगतान माध्यम शुल्क मुक्त रहेगा।
गौरतलब है कि याचिका में कहा गया है कि ये प्रावधान एक प्रेस बयान के जरिये घोषित किए गए हैं और शुल्क तय करने वाला पूरा आदेश आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित नहीं किया गया है। इसके अलावा शुल्क दरों सहित लेनदेन सीमा, अधिकतम सीमा और अलग-अलग क्षेत्रों के वर्गीकरण को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
इस व्यवस्था के हवाले से याचिका में दावा किया गया है कि इसका मनमानी और भेदभावपूर्ण है तथा इससे कम मार्जिन पर काम करने वाले व्यापारियों पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। इसमें उपभोक्ताओं पर अप्रत्यक्ष बोझ और डिजिटल भुगतान से वंचित होने की आशंका भी जताई गई है।