यूएन सर्वेक्षण ने बड़े युद्ध के ख़तरे को इस समय की सबसे बड़ी वैश्विक चिन्ता बताया

एक ओर विशेषज्ञ युद्ध छिड़ने के खतरे को वर्तमान की सबसे बड़ी चिन्ता बता रहे हैं तो वहीँ जोखिमों का आकलन करने वाला सर्वेक्षण बताता है कि दुनिया इस तरह के युद्ध से निपटने के लिए पर्याप्त रूप से तैयार नहीं है।

वैश्विक जोखिमों का आकलन करने वाले विशेषज्ञों ने पूर्ण पैमाने का युद्ध छिड़ने के खतरे को वर्तमान की सबसे बड़ी चिन्ता बताया है। संयुक्त राष्ट्र की नई वैश्विक जोखिम रिपोर्ट के अनुसार, दो साल पहले तक इसे एक दूर की आशंका माना जाता था।

हालाँकि संयुक्त राष्ट्र ने स्पष्ट किया है कि यह रिपोर्ट भविष्यवाणी नहीं करती, बल्कि मौजूदा समय में विभिन्न जोखिमों को लेकर लोगों की सोच और चिन्ताओं की तस्वीर पेश करती है।

सर्वेक्षण में शामिल लोगों का मानना है कि इन ख़तरों को रोकने का सबसे प्रभावी उपाय यह है कि सरकारें साथ मिलकर काम करें। कोई भी देश, कम्पनी या संस्था इन जोखिमों का अकेले सामना नहीं कर सकती।

यह अध्ययन सरकारों, अन्तरराष्ट्रीय संगठनों, नागरिक समाज, निजी क्षेत्र और शिक्षा जगत से जुड़े 1,300 लोगों की राय पर आधारित है, जो दुनिया के सभी क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसमें 28 राजनैतिक, आर्थिक, पर्यावरणीय, सामाजिक और तकनीकी ख़तरों का आकलन इस आधार पर किया कि उनके होने की कितनी सम्भावना है, वे कितना नुक़सान पहुँचा सकते हैं और उनसे निपटने के लिए दुनिया कितनी तैयार है.

रिपोर्ट बताती है कि 2024 की तुलना में बड़े पैमाने पर युद्ध का ख़तरा 16 पायदान ऊपर आ गया है। सूची में किसी भी अन्य जोखिम के मुक़ाबले यह सबसे बड़ी बढ़ोत्तरी है। सर्वेक्षण में शामिल 36 प्रतिशत लोगों का मानना है कि अगले एक साल में इसका असर दुनिया की आबादी के एक बड़े हिस्से पर पड़ सकता है वहीं 76 प्रतिशत लोगों ने अगले सात वर्षों में ऐसा होने की सम्भावना जताई।

दो साल पहले प्रमुख चिन्ताओं में पर्यावरणीय ख़तरे, ग़लत सूचना और महामारियाँ थीं। अब भू-राजनैतिक तनाव, युद्ध और क़ानून के शासन का कमज़ोर पड़ना प्रमुख चिन्ताओं में आ गए हैं।

महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने रिपोर्ट की प्रस्तावना में लिखा,’यह निष्कर्ष गम्भीर चिन्ता पैदा करते हैं। राजनैतिक जोखिम अब सबसे आगे आ गए हैं। दो साल पहले की तुलना में अब बड़े पैमाने पर युद्ध की आशंका को कहीं अधिक अहम और कहीं अधिक तात्कालिक माना जा रहा है।’

आगे उन्होंने कहा,’साथ ही, इन ख़तरों से निपटने के लिए जिन संस्थानों से कार्रवाई की उम्मीद की जाती है, उनकी क्षमता को लेकर भरोसा भी घटा है।’ रिपोर्ट के अनुसार, कोई भी जोखिम अकेले नहीं उभरता। प्राकृतिक संसाधनों की कमी, आर्थिक बिखराव, ग़लत सूचना और कमज़ोर पड़ती बहुपक्षीय संस्थाएँ, भू-राजनैतिक तनाव को बढ़ाती हैं, जिससे बड़े पैमाने पर युद्ध का ख़तरा भी बढ़ता है।

सर्वेक्षण में अलग-अलग जोखिमों के बीच 705 संबंधों की पहचान की गई। इनमें भू-राजनैतिक तनाव और युद्ध के बीच सबसे मज़बूत सम्बन्ध पाया गया। रिपोर्ट के लेखकों ने आगाह किया है कि कुछ पर्यावरणीय जोखिमों का सूची में नीचे खिसकना यह नहीं दर्शाता कि वे कम ख़तरनाक हो गए हैं। इसका मतलब केवल इतना है कि अब उन पर कम ध्यान दिया जा रहा है। और जिन मुद्दों पर ध्यान कम होता है, उनके लिए वित्तीय सहायता भी अक्सर घट जाती है।

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