सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा कि जलवायु संकट पर कार्रवाई करना राज्यों का कानूनी दायित्व है

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा है कि जीवन, पारिस्थितिक तंत्र और वैश्विक जलवायु प्रणाली की रक्षा करना कोई नीतिगत विकल्प नहीं बल्कि एक क़ानूनी दायित्व है।

सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा कि जलवायु संकट पर कार्रवाई करना राज्यों का कानूनी दायित्व है

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) ने वैश्विक जलवायु न्याय के लिए एक ऐतिहासिक सलाहकार राय जारी की है, जिसमें इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत सभी सरकारों का जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए निर्णायक कार्रवाई करने का कानूनी कर्तव्य है। यह निर्णय इस बढ़ती अंतर्राष्ट्रीय सहमति को पुष्ट करता है कि जलवायु की रक्षा करना वैकल्पिक नहीं, बल्कि एक बाध्यकारी कानूनी दायित्व है।

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए कहा- “मैं अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय द्वारा अपनी ऐतिहासिक सलाहकार राय जारी करने का स्वागत करता हूँ। उन्होंने स्पष्ट किया कि सभी राज्यों का अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत वैश्विक जलवायु प्रणाली की रक्षा करना दायित्व है। यह हमारे ग्रह, जलवायु न्याय और युवाओं की बदलाव लाने की क्षमता की जीत है।”

गुटेरेस ने इस कार्रवाई के आह्वान की शुरुआत करने वाले प्रशांत द्वीपवासियों की प्रशंसा की और इस बात पर ज़ोर दिया कि पेरिस समझौते का 1.5°C का लक्ष्य अब सभी राष्ट्रीय जलवायु नीतियों का आधार होना चाहिए।

ग्रीनपीस स्विट्ज़रलैंड के जॉर्ज क्लिंगलर के अनुसार के अनुसार, हर देश को वर्तमान और भावी पीढ़ियों की रक्षा करनी चाहिए। उनका मानना है कि यह फ़ैसला दुनिया भर में और भी ज़्यादा जन-संचालित जलवायु मुक़दमेबाज़ी अभियानों को गति देगा।

यूरोपीय मानवाधिकार न्यायालय में बहुचर्चित क्लिमासीनियोरिनन मामले में मुख्य वकील कॉर्डेलिया बहर ने इसे ने इसे एक ऐतिहासिक क्षण बताया। दुनिया की शीर्ष अदालतें अब सर्वसम्मति से इस बात की पुष्टि करती हैं कि सरकारों का जलवायु संकट से लोगों की रक्षा करना कानूनी कर्तव्य है। उनका कहना है कि सरकारों को अब आगे आकर यह काम करना होगा।

फैसले की पृष्ठभूमि
आईसीजे की यह राय वानुअतु सरकार के नेतृत्व में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 2023 में किए गए एक अनुरोध पर आधारित है, जिसमें जलवायु संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत राज्यों की ज़िम्मेदारियों पर कानूनी स्पष्टता की मांग की गई थी। सौ से ज़्यादा देशों ने अदालत में साक्ष्य और कानूनी दलीलें पेश कीं।

हालाँकि यह राय सलाहकारी है, यह बाध्यकारी अंतर्राष्ट्रीय कानून की एक आधिकारिक व्याख्या पर आधारित है, और वैश्विक जलवायु कार्रवाई को आकार देने में महत्वपूर्ण नैतिक और कानूनी महत्व रखेगी।

अदालत के मुख्य निष्कर्ष इस प्रकार है-

  • सभी राज्य ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के लिए तत्काल कार्रवाई करने के लिए बाध्य हैं।
  • लोगों और ग्रह को गंभीर और अपरिवर्तनीय क्षति से बचाने के लिए जीवाश्म ईंधन को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करना एक कानूनी कर्तव्य है।
  • कार्रवाई करने में विफलता अंतर्राष्ट्रीय दायित्वों का उल्लंघन है, विशेष रूप से कमजोर आबादी और भावी पीढ़ियों के प्रति।

अदालत की यह राय नीदरलैंड, दक्षिण कोरिया, जर्मनी, बेल्जियम, अंतर्राष्ट्रीय समुद्री कानून न्यायाधिकरण, अंतर-अमेरिकी मानवाधिकार न्यायालय और यूरोपीय मानवाधिकार न्यायालय के ऐतिहासिक फैसलों पर आधारित है—इन सभी ने सरकारों को अपर्याप्त जलवायु कार्रवाई के लिए कानूनी रूप से जवाबदेह ठहराया है। जलवायु अधिवक्ताओं और कानूनी विशेषज्ञों की प्रतिक्रियाएँ

जलवायु मुकदमेबाजी नेटवर्क (सीएलएन) की सह-निदेशक सारा मीड ने इस फैसले का स्वागत करते हुए इसे दुनिया भर के अधिकांश लोगों की उस इच्छा को प्रमाणित करना बताया है जो वे अपनी सरकारों से सार्थक जलवायु कार्रवाई चाहते हैं। आगे उनका कहना था कि अधिकांश राष्ट्रीय योजनाएँ हमें सुरक्षित रखने में विफल रहती हैं, इसलिए अधिक लोग अदालतों का रुख कर रहे हैं। उनके मुताबिक़,आज कानून उनके पक्ष में मजबूती से खड़ा है।

जलवायु संकट से निपटने में अंतर्राष्ट्रीय क़ानून की भूमिका वाले इस फैसले को जानकर एक महत्वपूर्ण मोड़ बता रहे हैं। उनके अनुसार अब इस मामले में सरकारें देरी या कमज़ोरी नहीं दिखा सकतीं।

बताते चलें कि यह फ़ैसला ऐसे समय में आया है जब बेल्जियम, कनाडा, चेक गणराज्य, फ़्रांस, इटली, नीदरलैंड, न्यूज़ीलैंड, पुर्तगाल, स्पेन, स्वीडन, ताइवान, तुर्की और कई अन्य देशों में मुक़दमे लंबित हैं। नागरिक समाज और क़ानूनी अधिवक्ताओं द्वारा संचालित इन मुक़दमों का उद्देश्य जलवायु निष्क्रियता के लिए सरकारों और निगमों को जवाबदेह ठहराना है।

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