इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य के प्रशासनिक तंत्र की कड़ी आलोचना की है। कोर्ट ने कहा कि राज्य का प्रशासनिक तंत्र लगातार सरकारों के दौर में गहरे राजनीतिक दखल का शिकार रहा है। हाईकोर्ट ने यह फटकार ग़ाज़ीपुर के एक गैंगस्टर एक्ट के मामले को रद्द करते हुए लगाईं।
इलाहबाद हाईकोर्ट ने यूपी की अफसरशाही और पुलिसिंग को लेकर बेहद गंभीर टिप्पणी की है। जस्टिस विनोद दिवाकर की बेंच ने कहा कि यूपी में आज भी सामंती सोच हावी है। यहाँ के अधिकारी संविधान के बजाए सत्ता में बैठे नेताओं के प्रति ज़्यादा वफादार हैं।
इसे एक जानी-मानी बात बताते हुए आलोचना में अदालत का कहना है कि जो अधिकारी वफादार माने जाते हैं, उन्हें मनपसंद पोस्टिंग – जैसे शहरी कमिश्नरेट, मलाईदार ज़िले दी जाती हैं, जबकि आज़ादी से काम करने वालों का सज़ा के तौर पर कम महत्व वाले कामों में तबादला कर दिया जाता है।
अदालत ने यह भी कहा कि कुछ मामलों को छोड़कर, अधिकारियों के तबादले, पोस्टिंग और प्रमोशन अक्सर योग्यता-आधारित शासन के बजाय राजनीतिक संरक्षण का साधन रहे हैं।
जस्टिस विनोद दिवाकर की बेंच ने अपने 31 पन्नों के आदेश में कहा कि उत्तर प्रदेश ऐतिहासिक रूप से राजनेताओं और नौकरशाहों की “सामंती मानसिकता” से चलता रहा है। अदालत ने यह भी कहा कि इसने लंबे समय से संवैधानिक शासन को जनसेवा के बजाय व्यक्तिगत प्रभुत्व का साधन बना दिया है।
गौरतलब है कि कोर्ट ने यह फटकार ग़ज़ियाबाद के एक गैंगस्टर एक्ट मामले को रद्द करते हुए लगाई। यहाँ पुलिस ने एक व्यापारिक मामले में पूरे परिवार पर गैंगस्टर एक्ट लगा दिया था।
मनमाने ढंग से अधिकारियों की मर्ज़ी का ज़िक्र करते हुए बेंच ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि बिना उचित प्रक्रिया के गिरफ्तारियां की जाती हैं। साथ ही अदालत ने कई एफआईआर के गलत इरादों से दर्ज किए जाने या दबा दिए जाने की बात भी सामने रखी। इसके अलावा प्रिवेंटिव डिटेंशन यानी एहतियाती हिरासत के प्रावधानों का इस्तेमाल पर भी अदालत ने आलोचना की।