दुनिया आज भी इस जानकारी से वंचित है कि यहाँ कितने लोग विकलांगता के साथ जी रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनिया में हर छह में से एक व्यक्ति- यानि एक अरब से अधिक लोग, किसी न किसी रूप में विकलांगता के साथ जीते हैं। इसके बावजूद कई देशों में उनकी सही गिनती नहीं हो पाती। जब गिनती सही नहीं होती, तो बहुत से लोग नज़र से ओझल रह जाते हैं। और ओझल रह जाने वाले ये लोग अक्सर स्वास्थ्य, शिक्षा और रोज़गार से जुड़े फ़ैसलों में पिछड़ जाते हैं।

इन्हीं मुद्दों को लेकर भारत के गोवा प्रदेश में लगभग 15 देशों के प्रतिनिधि ‘International Purple Festival 2025’ के लिए एकत्र हुए। भारत में आधिकारिक आँकड़े केवल 2.2% आबादी को विकलांग दिखाते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार लाखों लोग, सामाजिक कलंक, संकीर्ण परिभाषाएँ और सर्वेक्षण के पुराने तरीक़ों के कारण, इस गिनती से छूट जाते हैं।
भारत में विश्व स्वास्थ्य संगठन के विकलांगता और पुनर्वास के राष्ट्रीय अधिकारी डॉक्टर मोहम्मद अशील कहते हैं, “सटीक आँकड़ों के बिना सबसे अच्छे क़ानून भी खोखले वादे बन जाते हैं। हमारे पास नीतियाँ हैं, लेकिन हम यह जाने बिना कि लोग कौन हैं और कहाँ रहते हैं, पुनर्वास या स्वास्थ्य सेवाओं की प्रभावी योजना नहीं बना सकते।”
भारत में यूनीसेफ़ की बाल सुरक्षा विशेषज्ञ वन्दना खंडारी ने विकलांग बच्चों की अदृश्यता पर चिन्ता जताई। उन्होंने कहा, “दुनिया भर में विकलांग बच्चों को हिंसा और उपेक्षा का ख]तरा सामान्य बच्चों की तुलना में तीन गुना ज़्यादा होता है। दक्षिण एशिया में तो कई बच्चों की गिनती तक नहीं होती. जो बच्चे आँकड़ों में नहीं दिखते, वे ज़िन्दगी में भी नज़र नहीं आते।”
उन्होंने उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ में चल रही पायलट परियोजनाओं के उदाहरण पेश किए, जहाँ स्वयंसेवक जन, बच्चों की शुरुआती पहचान करते हैं, उन्हें सेवाओं से जोड़ते हैं और जानकारी ज़िला योजना तक पहुँचाते हैं। उन्होंने कहा, “यही है समावेशी जनगणना का असली रूप,” “जब गिनती की जाती है, तो वह देखभाल में बदल जाती है।”
भारत सरकार के साथ 2027 की जनगणना पर काम करते हुए, यूएनएफ़पीए के जनसंख्या और अनुसंधान विशेषज्ञ डॉक्टर संजय कुमार ने तकनीकी चुनौतियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, “हम रजिस्ट्रार जनरल के साथ मिलकर 2027 की जनगणना को वास्तव में समावेशी बनाने पर काम कर रहे हैं। पिछली जनगणना में एक से अधिक तरह की विकलांगता की श्रेणी ने कई वास्तविकताओं को छिपा दिया था। अब हम गणनाकर्ताओं के लिए डिजिटल साधन और मोबाइल ऐप विकसित कर रहे हैं, ताकि हर घर तक पहुँचा जा सके और हर व्यक्ति को सही तरीक़े से शामिल किया जा सके।”
इस अवसर पर डॉक्टर मोहम्मद अशील ने केरल की 2016 की विकलांगता-विशेष जनगणना को याद किया, जिसने जियो-टैगिंग और व्यक्तिगत देखभाल योजनाएँ लागू की थीं।
उन्होंने कहा, “हमने सीखा कि डेटा जीवन बचा सकता है। 2018 की बाढ़ के दौरान, विशेष प्रकार की विकलांगता वाले लोगों के स्थानों के बारे में जानकारी होना राहत और बचाव को कहीं अधिक प्रभावी बना गया। सोचिए, अगर हर देश अपनी अगली जनगणना में यह कर सके।”
उन्होंने कहा, “गिनती केवल संख्या भर नहीं है। यह बताती है कि प्रसन्नता सभी तक बराबरी से पहुँच रही है या नहीं।” उन्होंने कहा कि भूटान वॉशिंगटन ग्रुप के अन्तरराष्ट्रीय प्रश्न-श्रृंखला अपनाता है, ताकि उसका डेटा दुनिया भर से तुलना-योग्य रहे। “अगर भारत अब 21 तरह की विकलांगताओं की गिनती करता है, तो यह हमारे लिए अपनाने लायक एक मज़बूत मॉडल है।”
मालदीव में विकलांगता परिषद की अध्यक्ष और से दो बार की पैरालम्पियन, फ़ातिमा इब्राहीम ने मज़बूत और जुड़े हुए विकलांगता डेटाबेस की मांग की। उन्होंने कहा, “हमारे द्वीप बिखरे हुए हैं। भरोसेमंद आँकड़ों के बिना लोग व्यवस्था की दरारों में खो जाते हैं। जब आपको यह ही नहीं मालूम कि किसे क्या चाहिए, तो आप विश्वविद्यालय, रोज़गार या खेल कार्यक्रम किस तरह तैयार करेंगे? एक अच्छी जनगणना ही न्यायपूर्ण भविष्य की नींव है।”
संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों ने कई सत्रों में एक ही सन्देश दोहराया – समावेशन के लिए डेटा क्रान्ति की ज़रूरत है। बच्चों के अधिकारों पर यूनीसेफ़ के सत्र ने इस चर्चा को एक नई दिशा दी।
