जबलपुर की पहाड़ियों में मिले मशरूम से हैरान पर्यावरण प्रेमी ने इसे मिट्टी और जलवायु की संपन्नता बताया

जबलपुर के मदन महल की पहाड़ियों में दुनिया के सबसे बड़े मशरूमों में शामिल बोंडारजेविया बर्कलेई की मौजूदगी से पर्यावरण प्रेमियों ने इसपर ख़ुशी ज़ाहिर की है चर्चा का विषय बताया है। विशेषज्ञों ने इसे एक रोमांचक खोज बताया है। मदन महल की पहाडिय़ों में इस दुर्लभ प्रजाति के मिलने से यहां की मिट्टी और जलवायु की संपन्नता की बात भी सामने आई है।

उत्तरी अमेरिका का एक बड़ा मशरूम बोंडारजेविया बर्कलेई, जबलपुर के मदन महल की पहाड़ियों में में मिलने से पारिस्थितिक तंत्र का विषय इस समय एक बार फिर चर्चा में है। यहाँ के शैलपर्ण उद्यान, देवताल के समीप पर्यावरणविदों और शोधकर्ताओं को बोंडारजेविया बर्कलेई मशरूम मिला है। जानकारों का कहना है कि इसका शुमार दुनिया के सबसे बड़े मशरूमों किया जाता है।

डारजेविया बर्कलेई की सबसे बड़ी खासियत इसका आकार है। विशेषज्ञों के अनुसार, इसका घेरा 50 से 100 सेंटीमीटर तक चौड़ा हो सकता है और यह पंखुडियों के गुच्छे के रूप में उगता है, जिसका रंग क्रीम, मटमैला या हल्का भूरा होता है।

क्यूंकि मशरूम की यह किस्म मुख्य रूप से उत्तरी अमरीका और एशिया के कुछ ही हिस्सों मिलती है। मगर अचानक जबलपुर में इसकी उपस्थिति ने शहर के जैव विविधता प्रेमियों को हैरान कर दिया है। ऐसे में विशेषज्ञ सलाह दे रहे हैं कि इस मशरूम को बिना टेस्ट के नहीं खाना चाहिए। उनके मुताबिक़, जहरीले मशरूम दिखने में बर्कलेई जैसे हो सकते हैं, जो जानलेवा साबित भी हो सकते हैं।

वनस्पति विशेषज्ञों के मुताबिक़, मदन महल की पहाडिय़ों में इसका मिलना समृद्ध जैव विविधता और अनुकूल वनस्पतिक परिस्थितियों का संकेत है। यह मशरूम पुराने ओक के पेड़ों की जड़ों या उनके ठूंठ पर निकल आते हैं। इसी क्रम में मदन महल की पहाडिय़ों में मौजूद कठोर लकड़ी के पेड़ों के आधार पर भी यह पनप गया है।

एक्सपर्ट का कहना है कि यह शुरुआत में एक परजीवी के रूप में पेड़ में बट रॉट पैदा करता है, लेकिन पेड़ के मृत होने के बाद भी यह वहीं उगता रहता है। लकड़ी के अपघटन के साथ मिट्टी को पोषक तत्व वापस पहुंचाने की प्रक्रिया में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है।

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