संयुक्त संसदीय समिति के अध्यक्ष ने कहा- अबकी बार मुमकिन नहीं है ‘एक देश एक चुनाव’ पर अमल

‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ से जुड़े विधेयकों पर संयुक्त संसदीय समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी ने द इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक साक्षात्कार में इस मामले पर प्रकाश डाला।

संयुक्त संसदीय समिति के अध्यक्ष ने कहा- अबकी बार मुमकिन नहीं है 'एक देश एक चुनाव' पर अमल

‘एक राष्ट्र एक चुनाव’ के मुद्दे पर गहन विचार-विमर्श के बाद उनका जवाब था कि अगर बहुत जल्दी की जाए तो भी मौजूदा विधेयकों के तहत एक साथ लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनाव 2034 में ही संभव हो सकते हैं।

उनके अनुसार इसको शुरू भी कर दिया गया और लोकसभा या किसी विधानसभा के कार्यकाल से पहले ही सरकार गिर गई तो क्या होगा? या फिर लोकसभा या विधानसभा चुनाव में त्रिशंकु जनादेश अथवा केंद्र या राज्य सरकार के गिरने की स्थिति में क्या होगा? जैसे सवालों पर उन्होंने कहा है कि समिति इस मुद्दे पर गहन विचार-विमर्श कर रही है और अंतिम निर्णय संसद द्वारा लिया जाएगा।

लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों को ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ के तहत एक साथ आयोजित करने के पीछे सरकार का यह तर्क है कि इससे बार-बार होने वाले चुनावों से होने वाले आर्थिक और प्रशासनिक बोझ को कम किया जा सकेगा।

आगे उन्होंने कहा- ‘समिति चर्चा करेगी, संसद निर्णय लेगी। हम निश्चित रूप से तारीख़ नहीं बता सकते, लेकिन विधेयक के अनुसार, अगर नियत तारीख़ के साथ संसद का पहला सत्र शुरू होता है, तो यह 2034 से संभव हो सकता है।’

कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने इन बिलों को 17 दिसंबर, 2024 को पेश किया था और ये पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्च-स्तरीय समिति की सिफारिशों पर आधारित थे।

इस प्रस्ताव के तहत संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 शामिल हैं। दिसंबर 2024 में लोकसभा में पेश किए जाने के बाद इन्हें तुरंत चौधरी की अध्यक्षता वाली समिति को सौंपा गया। समिति इस पर परामर्श कर रही है।

इस महत्वाकांक्षी सुधार को लागू करने में सबसे बड़ी बाधा संवैधानिक संशोधन के लिए ज़रूरी दो-तिहाई बहुमत है और यह फ़िलहाल एनडीए के पास नहीं है। संसदीय समिति के अध्यक्ष चौधरी ने इस पर विश्वास जताया कि ‘राष्ट्रीय हित’ को प्राथमिकता देने वाले दल इन विधेयकों का समर्थन करेंगे।

इस प्रावधान की आलोचना कई स्तरों पर की गई है। वहीँ विधेयक में यह प्रावधान है कि एक बार क़ानून अधिसूचित हो जाने के बाद सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव अगले संसदीय चुनाव के साथ होंगे, चाहे उनकी शेष अवधि कितनी भी हो।

हालाँकि ड्राफ्ट क़ानून में लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ लाने के लिए प्रावधान है, चौधरी ने कहा कि समिति सिंक्रनाइजेशन बनाए रखने के लिए अतिरिक्त सिफारिशें कर सकती है। ऐसा ही एक सुझाव रचनात्मक अविश्वास प्रस्ताव हो सकता है, जैसा कि जर्मनी में है। इसमें विधायिका के सदस्यों को सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए सरकार बनाने की संख्या होनी चाहिए।

इस बिल के पास हो जाने पर राष्ट्रपति नवनिर्वाचित लोकसभा के पहले सत्र में नियत तारीख की अधिसूचना जारी करेंगे और उसके बाद चुनी गई हर राज्य या केंद्र शासित प्रदेश की विधानसभा का कार्यकाल लोकसभा के साथ करने के लिए छोटा किया जाएगा। इससे लोकसभा के पांच साल के कार्यकाल के अंत में एक साथ चुनाव हो सकेंगे।

लोकसभा या विधानसभा चुनावों में त्रिशंकु जनादेश या केंद्र अथवा राज्य सरकार के गिरने की दशा में क्या होगा? के सवाल पर चौधरी का कहना था- ‘संविधान में अभी भी अविश्वास प्रस्ताव का ज़िक्र नहीं है; यह लोकसभा में प्रक्रिया और कार्य संचालन नियमों के नियम 198 के तहत संचालित होता है। हम स्थिरता के लिए कुछ प्रावधान ला सकते हैं। हम संविधान में नए प्रावधानों की सिफारिश कर सकते हैं।’

चौधरी के अनुसार, समिति इस मुद्दे पर विचार-विमर्श कर सकती है और यह संसद को तय करना है। वहीँ विपक्ष के कुछ लोग आलोचना करते हुए कह रहे हैं कि यह क़दम लोकतंत्र विरोधी होगा।

इसके जवाब में चौधरी ने अपने अनुभव के आधार पर ये तर्क दिया कि एक साथ चुनाव लोकतंत्र के उद्देश्य को बढ़ाएंगे। उन्होंने कहा- ‘हमारा अनुभव है कि जिन राज्यों में एक साथ चुनाव होते हैं, वहां मतदान 10-20% अधिक होता है। क्या यह लोकतंत्र के हित में है या खिलाफ? अगर केवल 40% मतदान होता है और पीएम या सीएम 21% वोटों से चुने जाते हैं, तो क्या यह लोकतंत्र है? मुझे विश्वास है कि एक साथ चुनाव होने पर मतदान 80% से अधिक होगा। लोगों की इच्छा की अभिव्यक्ति अधिक मजबूत होगी और यह लोकतंत्र को मजबूत करेगा। एक साथ चुनाव न कराना लोकतंत्र विरोधी है।’

अपने तर्क में उन्होंने पहले तीन चुनाव 1967 तक एक साथ होने की बात कही और सवाल किया कि क्या वे चुनाव संघवाद के खिलाफ थे?

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