अमरीकी बहुराष्ट्रीय निवेश बैंक और वित्तीय सेवा कंपनी मॉर्गन स्टेनली की नवीनतम रिपोर्ट बताती है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के विस्तार के लिए न केवल बिजली, बल्कि जल संसाधनों की भी भारी मात्रा में जरूरत पड़ेगी।

यूआईडीएआई यानी भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण द्वारा एक अरब से अधिक भारतीयों की पहचान में सेंध लगने से रोकने के लिए एआई आधारित अगली पीढ़ी के डिजिटल सुरक्षा ढांचे की शुरुआत की है। इस पहल में आधार नामांकन और अपडेट के दौरान फिंगरप्रिंट, चेहरे और आईरिस की सटीकता बढ़ेगी ताकि डुप्लिकेट आईडी न बन सकें।
रिपोर्ट के मुताबिक, एआई डाटा केंद्रों के पानी की वार्षिक जरूरत 2024 के अनुमानों के मुकाबले 2028 तक 11 गुना बढ़कर करीब 1,068 अरब लीटर तक शुद्ध पानी की आवश्यकता होगी। गौरतलब है कि प्रत्येक नागरिक की एक विशिष्ट पहचान के सिद्धांत को बनाए रखने के लिए यूआईडीएआई, दुनिया के सबसे बड़े बायोमेट्रिक डुप्लीकेशन सिस्टम में से एक का संचालन करता है। प्रत्येक नए आधार नामांकन का संपूर्ण पंजीकृत आधार डेटाबेस से मैच कराया जाता है ताकि उसकी विशिष्टता सुनिश्चित हो सके।
यूआईडीएआई ने इस सुरक्षा ढांचे को और मजबूत बनाने के लिए हैदराबाद स्थित अंतरराष्ट्रीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान के सहयोग से उंगलियों के निशान, चेहरे और आंखों की पुतली जैसी सभी बायोमेट्रिक पद्धतियों के लिए स्वदेशी रूप से उन्नत एआई मॉडल विकसित किए हैं।
गौरतलब है कि डुप्लिकेशन हटाने के प्रत्येक प्रयास में अरबों गणनाएं शामिल होती हैं। एआई आधारित ये मॉडल फर्जी नामांकन को रोकने के लिए एनवीडिया डीजीएक्स के उच्च प्रदर्शन इन्फरेंस इंफ्रास्ट्रक्चर पर चलते हैं जिससे जनसंख्या स्तर पर आंकड़ों की सुरक्षित ढंग से गणना और मिलान संभव हो पाता है।
यूआईडीएआई की ओर से पहले ही कई राज्यों के लिए उन्नत डुप्लिकेशन हटाने की प्रक्रिया पूरी की जा चुकी है। आने वाले महीनों में इसे राष्ट्रव्यापी स्तर पर डाटा के मिलाने में सक्षम बना लिया जाएगा।
इसके अलावा गूगल की हालिया एनवायरमेंटल रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2023 में गूगल के डेटा सेंटर्स को कुल 6.1 अरब गैलन (लगभग 23 अरब लीटर) शुद्ध पानी की आवश्कता पड़ी थी। यह पिछले वर्ष की तुलना में 17 फीसदी की भारी वृद्धि है। इसमें एआई सर्वरों को ठंडा रखने और उनके संचालन के लिए जरूरी बिजली उत्पादन में पानी की जरूरत पड़ेगी।
बताते चलें कि एआई से तस्वीर बनाने के दौरान भारी ऊष्मा पैदा होती है। इन करोड़ों रुपये की मशीनों को पिघलने से बचाने के लिए कूलिंग टावर्स का उपयोग किया जाता है। वाष्पीकरण कूलिंग पर काम करने वाले इन सिस्टम में गर्म सतहों पर पानी डाला जाता है, जो गर्मी सोखकर भाप बन जाता है। इस प्रक्रिया में लगभग 80 फीसदी पानी भाप बनकर हवा में उड़ जाता है।
इस संबंध में इससे पहले भी कई रिपोर्ट्स सचेत कर चुकी हैं। गूगल 2024 पर्यावरण रिपोर्ट के अनुसार , गूगल डेटा केंद्रों ने एक वर्ष में चौंका देने वाले 6.1 बिलियन गैलन ताजे पानी की खपत की। रिपोर्ट में, इस तकनीकी दिग्गज कंपनी ने संसाधनों की इस भारी खपत को स्वीकार किया। रिपोर्ट बताती है, “2023 में, हमारे डेटा केंद्रों ने 6.1 बिलियन गैलन पानी की खपत की, जो पिछले वर्ष की तुलना में 17% अधिक है, और बिजली की खपत में भी इसी तरह की वृद्धि हुई है।”
इलेक्ट्रानिक्स एवं आईटी मंत्रालय की तरफ से प्रस्तुत कराई गई जानकारी से पता चलता है कि भारत में डिजिटल सुरक्षा ढांचे को मजबूती प्रदान करने के लिए यूआईडीईआई की तरफ से शुरू की गई यह प्रणाली एआई-सक्षम है, जो त्वरित कंप्यूटिंग का इस्तेमाल करके पल भर में करोड़ों गणनाएं कर लेती है।
