धरती पर कई हिस्सों में युद्ध और अशान्ति का दौर जारी है। इसके नतीजे में यौन हिंसा के मामलों में बीते साल रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की गई है। एक ताजा रिपोर्ट से पता चलता है कि सरकारी और गै़र-सरकारी- दोनों ही पक्षों ने, यौन हिंसा का इस्तेमाल, युद्ध, यातना, आतंकवाद और राजनैतिक दमन के औज़ार के रूप में किया है। इस माध्यम से तक़रीबन 4 हज़ार 600 से अधिक लोगों को शिकार बनाया गया है। यह आँकड़ा, वर्ष 2023 की तुलना में यौन हिंसा में 25 प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाता है।

संयुक्त राष्ट्र महासचिव की 16वीं वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में 21 देशों में युद्ध से सम्बन्धी यौन हिंसा के मामले दर्ज किए गए। इनमें सबसे अधिक मामले केन्द्रीय अफ़्रीकी गणराज्य (CAR), काँगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC), हेती, सोमालिया और दक्षिण सूडान में दर्ज किए गए हैं।
युद्ध और अशान्ति से सम्बन्धित यौन हिंसा के प्रभावितों में सबसे अधिक संख्या लड़कियों की है जो 92 प्रतिशत है। मगर पुरुषों, लड़कों और भिन्न यौन रुचियों और भिन्न लैंगिक पहचान वाले लोगों, भिन्न नस्लीय और जातीय पृष्ठभूमि के लोगों और विकलांग व्यक्तियों को भी यौन हिंसा के शिकार बनाया गया है। इन प्रभावितों की उम्र एक वर्ष से लेकर 75 वर्ष तक थी।
संयुक्त राष्ट्र के, अशान्ति में यौन हिंसा पर विशेष प्रतिनिधि कार्यालय का कहना है- “ये चौंकाने वाले आँकड़े, इस सम्बन्ध में वैश्विक तस्वीर नहीं पेश करते हैं और ना ही इनसे इन अपराधों के स्तर का पूर्ण अन्दाज़ा होता है।”
इनमे बहुत से हमले ऐसे थे जिनमें अत्यधिक शारीरिक हिंसा भी की गई थी, जिसमें आनन-फानन में फाँसी दिया जाना भी शामिल था। जबकि सामाजिक बदनामी और हानिकारक सामाजिक बर्ताव के डर ने अक्सर युद्धकालीन बलात्कार से बचे लोगों और उससे पैदा हुए बच्चों को, गहरे सामाजिक व आर्थिक हाशिए पर धकेल दिया है।
कई प्रकार के उत्पीड़न
रिपोर्ट में हिरासत में यौन हिंसा में चिन्ताजनक वृद्धि की ओर इशारा किया गया है, जिसका इस्तेमाल अक्सर यातना, अपमान और जानकारी हासिल करने के साधन के रूप में किया गया. ऐसे मामलों में पुरुष और लड़के सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए, वहीं महिलाओं और लड़कियों को भी निशाना बनाया गया।
ग़ैर-सरकारी सशस्त्र समूहों ने इलाक़े और संसाधनों पर नियंत्रण मज़बूत करने व चरमपंथी विचारधाराओं को लागू करने के लिए ऐसे अपराध किए। छोटे हथियारों की व्यापक उपलब्धता, बड़े पैमाने पर विस्थापन और खाद्य असुरक्षा ऐसे कारक बताए गए हैं, जिनके कारण जोखिम और अधिक बढ़े हैं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि संघर्ष में शामिल पक्षों ने अक्सर पीड़ितों के लिए मानवीय सहायता की पहुँच को अवरुद्ध या प्रतिबन्धित कर दिया।
संघर्ष में यौन हिंसा पर विशेष प्रतिनिधि प्रमिला पैटन ने कहा है- “स्वास्थ्य सेवा सुविधाओं के गम्भीर रूप से तबाह होने और इस तबाही के व्यापक पैमाने, और अग्रिम पंक्ति के सेवा कार्यकर्ताओं पर हमले, उत्पीड़न और धमकियों ने, यौन हिंसा के भुक्तभोगियों के लिए जीवन रक्षक सहायता तक पहुँच को गम्भीर रूप से बाधित किया है।”
क़ानून की अनदेखी
रिपोर्ट में सशस्त्र संघर्षों में यौन हिंसा के रुझान के लिए विश्वसनीय रूप से संदिग्ध या ज़िम्मेदार 63 सरकारी और ग़ैर-सरकारी तत्वों की सूची दी गई है। वैसे तो अन्तरराष्ट्रीय मानवीय क़ानून पर पालन का स्तर कम रहा है, फिर भी कई पक्षों ने अपराधों से निपटने के लिए औपचारिक प्रतिबद्धताएँ व्यक्त की हैं।
रिपोर्ट में लगातार अपराध करने वाले पक्षों पर निशाना साधने के लिए सुरक्षा परिषद की प्रतिबन्ध समितियों का सहारा लेने की सिफ़ारिश की गई है। साथ ही यह भी कहा गया है कि दाएश और अल-क़ायदा के विरुद्ध सुरक्षा परिषद की आतंकवाद-रोधी व्यवस्था के तहत, अब यौन और लिंग-आधारित हिंसा स्पष्ट रूप से प्रतिबन्ध योग्य है।
रिपोर्ट में सभी पक्षों से यौन हिंसा पर प्रतिबन्ध लगाने वाले स्पष्ट आदेश जारी किए जाने, जवाबदेही सुनिश्चित करने और निगरानी एवं सेवा उपलब्ध कराने के लिए संयुक्त राष्ट्र तक निर्बाध पहुँच मुहैया कराने का आग्रह किया गया है। प्रमिल पैटन ने कहा है, “संघर्ष-सम्बन्धी यौन हिंसा पर, सुरक्षा परिषद ने, छह समर्पित प्रस्तावों के माध्यम से व्यक्त किया गया वादा – रोकथाम का है।”
उन्होंने कहा- “हम पीड़ितों के साथ एकजुटता व्यक्त करने से भी बढ़कर उनके क़र्ज़दार हैं; उन्हें सम्मानजनक जीवन देने के साथ-साथ, इन अपराधों को रोकने और इनके उन्मूलन के लिए प्रभावी व निर्णायक कार्रवाई करने की ज़िम्मेदारी हम पर है।”
