दुनिया भर में इस समय सौ से अधिक देश और क्षेत्र, तुरंत भुगतान का तरीका अपनाने वाली प्रणालियों पर निर्भर है। जिनमें से कई ने भारत के अनुभव से सीख ली है। विश्व बैन्क की एक नई रिपोर्ट से पता चलता है कि यह मॉडल दूसरे क्षेत्रों में कितना असरदार साबित हुआ है।

आज भारत में हर 10 में से 8 से ज़्यादा डिजिटल भुगतान इसी प्रणाली के ज़रिये होते हैं। देश में 50.4 करोड़ से अधिक अलग-अलग उपयोगकर्ता, या कह सकते हैं कि वयस्क आबादी का लगभग आधा हिस्सा, और 6.5 करोड़ से अधिक व्यापारी यूपीआई पर निर्भर हैं। कभी एक साहसिक प्रयोग लगने वाली सुविधा आज पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल बन चुकी है।
रिपोर्ट के अनुसार, लातिन अमरीका और कैरीबियाई क्षेत्र में, 2024 तक तेज़ भुगतान, कुल डिजिटल लेनदेन का 45 प्रतिशत हिस्सा हो चुके हैं, जबकि 2017 में यह आँकड़ा सिर्फ़ 2 प्रतिशत था।
फिर भी, भारत का पैमाना इन सभी से कहीं अलग और कहीं बड़ा है। केवल जुलाई से सितम्बर 2025 के बीच ही UPI के ज़रिये लगभग 59 अरब लेनदेन हुए। यह उसी अवधि में मास्टरकार्ड के वैश्विक लेनदेन से अधिक है और वीज़ा के दुनिया भर के आँकड़ों के क़रीब पहुँचता है।
भारत के मॉडल ने ग़ैर-बैन्क संस्थाओं के लिए प्रणाली को खुला बनाकर और तीसरे पक्ष के ऐप्स को प्रतिस्पर्धा की अनुमति देकर पुराने तरीक़ों को बदल दिया। यूपीआई ने नियंत्रण को केवल संस्थानों से हटाकर सीधे लोगों तक पहुँचा दिया।
लगातार हो रहे नवाचारों से उपयोगकर्ताओं के विकल्प भी बढ़े हैं। आसान शुरुआत से लेकर टैप-एंड-पे और बातचीत के ज़रिये भुगतान जैसे नए अनुभवों तक।आज UPI सिर्फ़ पैसे भेजने का ज़रिया नहीं है। यह रोज़मर्रा की आर्थिक ज़िंदगी से जुड़ा एक व्यापक और भरोसेमंद मंच बन चुका है।
