हाल ही में हुए एक सर्वे से पता चला है कि यूएस में रहने वाले भारतीय मूल के लोग बड़ी संख्या में देश छोड़ने पर विचार कर रहे हैं, जिसमें लगभग 40 फीसद लोगों ने कहा कि उन्होंने अलग-अलग कारणों से यूएस से बाहर जाने के बारे में सोचा है।
कार्नेगी एंडोमेंट का एक सर्वे बताता है कि 10 में से 4 इंडियन-अमरिकन्स, अमरीका छोड़ने के बारे में विचार कर रहे हैं। कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस की 2026 की रिपोर्ट ने इस समय देश ही नहीं पूरी दुनिया को अचम्भे में डाल दिया है। यह लोग उस समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं जो अमरीका की कुल आबादी का महज 1.5 फीसद हैं मगर वहां के टैक्स बेस में 6 फीसद का योगदान करते हैं।
एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, सर्वे में शामिल एक हज़ार लोगों में से 14 फीसद ने कहा कि वे अक्सर, जबकि 26 फीसद ने कहा कि वे कभी-कभी यूएस छोड़ने के बारे में सोचते हैं। इन जवाबों में सबसे बड़ा कारण देश की पॉलिटिक्स से निराशा थी, जिसे 58% लोगों ने महत्वपूर्ण बताया। इसके बाद 54 फीसद ने महंगाई और 41 फीसद ने पर्सनल सिक्योरिटी की चिंताओं को महत्वपूर्ण बताया।
रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा पॉलिटिकल माहौल और सरकारी पॉलिसी से नाखुशी ने इस ट्रेंड को बढ़ा दिया है, जिसमें 71 फीसद लोग इकोनॉमी, इमिग्रेशन और इंटरनेशनल रिलेशन जैसे मुद्दों पर सरकार के काम को पसंद नहीं करते हैं।
लोगों का मानना है कि इस बीच सामाजिक भेदभाव और असुरक्षा की भावना भी बढ़ी है, कई लोगों का कहना है कि उन्हें अपने रोज़ाना के व्यवहार बदलने के लिए मजबूर होना पड़ा है।
रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारतीयों के लिए ग्रीन कार्ड का वेटिंग पीरियड 30 से 40 साल तक पहुंच गया है। अब H-1B वीजा की अनिश्चितता के साथ इमिग्रेशन कागजों का डर परिवार की सबसे बड़ी दहशत है।
एक रिपोर्ट के मुताबिक़, जिन लोगों ने 2013-14 में ग्रीन कार्ड के लिए अप्लाई किया था वे अभी भी इंतज़ार कर रहे हैं। इस हवाले से GCReforms.org के अनुसार, कुछ कैटेगरी में यह इंतज़ार 70 साल तक हो सकता है।
आर्थिक दबाव भी एक बड़ा मुद्दा है, बड़े शहरों में घर और खर्च काफी बढ़ गए हैं, जहाँ एक कमरे का किराया और बच्चों की परवरिश का खर्च लोगों की हैसियत से ऊपर जा रहा है। इसके अलावा इमिग्रेशन सिस्टम की मुश्किलें, वीज़ा में देरी और परमानेंट रहने की पक्की उम्मीदें भी बड़े कारण हैं, लंबे इंतज़ार से प्रोफेशनल्स में चिंता बढ़ रही है।
महंगाई के अलावा‘हेट क्राइम’ और भेदभाव की चिंताएं भी बढ़ी हैं। हालांकि 2020 के बाद से प्रत्यक्ष हिंसा में बढ़ोत्तरी नहीं हुई है लेकिन ऑनलाइन और ऑफिसों में ‘बौद्धिक भेदभाव’ में बढ़ोतरी हुई है। साल 2026 के सर्वे में कई भारतीयों ने कहा कि वो अब खुद को वहां पूरी तरह सुरक्षित महसूस नहीं करते, जैसा एक दशक पहले करते थे।
मीडिया रिपोर्ट्सके मुताबिक़ , भारतीय-अमरीकियों के बीच राजनीतिक जुड़ाव भी बदल रहा है, और अब ज़्यादा लोग नौकरी, सुरक्षा और भविष्य की स्थिरता जैसे प्रैक्टिकल मुद्दों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
वहीँ व्हाइट हाउस की पूर्व सलाहकार और राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि अगर अमरीका ने अपनी इमिग्रेशन नीतियों में बदलाव नहीं किया, तो वह दुनिया के सबसे बेहतरीन दिमागों को खो देगा।
दूसरी ओर रिपब्लिकन रणनीतिकार इसे ‘अमरीका फर्स्ट’ की कामयाबी मान रहे हैं, जबकि लिबरल थिंक-टैंक इसे अमरीका की सांस्कृतिक विविधता के लिए खतरा बता रहे हैं।