चंद्रमा पर पानी किसी बड़ी घटना से नहीं बल्कि अरबों वर्षों में धीरे-धीरे जमा हुआ है- नई स्टडी

चंद्रमा पर पानी की उपलब्धता को वहां स्थायी मानव मिशन अभियान की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। चंद्रमा के इतिहास को समझने में मददगार यह अध्ययन यह संकेत भी देता है किअंतरिक्ष यात्री आने वाले समय में अन्य स्थानों पर पानी खोज जारी रख सकेंगे।

लंबे समय से वैज्ञानिक इस राज को पाने की कोशिश कर रहे हैं कि चन्द्रमा पर पानी का स्रोत क्या है। पानी की मौजूदगी पर हाल ही में सामने आने वाली एक नई स्टडी ने इस विषय पर बेहद दिलचस्प नजरिया पेश किया है। यह रिसर्च नेचर एस्ट्रोनॉमी जर्नल में पब्लिश हुई है।

यह नई स्टडी बताती है कि चंद्रमा पर पानी किसी एक बड़ी घटना के कारण नहीं, बल्कि अरबों वर्षों में धीरे-धीरे जमा हुआ है। वैज्ञानिकों के मुताबिक़ इस प्रक्रिया में करीब 3 से 3.5 अरब वर्ष का समय लगा है। इस खोज को भविष्य के अंतरिक्ष संबंधी उन अभियानों के सन्दर्भ में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है जिनमें चांद पर इंसानों के बसने की योजनाओं पर काम जारी है।

हालाँकि वैज्ञानिक चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर पानी मिलने की बात करते हैं। यह पानी आसपास मौजूद गहरे और स्थायी रूप से छायादार गड्ढों में बर्फ के रूप में जमा है। लेकिन अभी भी यह राज़ नहीं खुल सका है कि यह पानी दक्षिणी ध्रुव तक कैसे पहुंचा। यहाँ सवाल यह भी है कि कैसे यह कुछ गड्ढों में अधिक मात्रा में है जबकि कुछ में नहीं है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि चन्द्रमा पर पानी के कई सोर्स हो सकते हैं। वहीँ नई स्टडी इस संभावना को खारिज करती है कि चंद्रमा पर पानी किसी एक विशाल धूमकेतु के टकराने से आया है। इसके लिए प्राचीन ज्वालामुखीय गतिविधियां भी पानी के जमा होने का कारन हो सकती हैं जिनसे चंद्रमा के अंदर मौजूद जल सतह तक पहुंचा हो। इसके अलावा यहाँ तक पानी की पहुँच में धूमकेतुओं और एंस्ट्रॉइड्स भी माध्यम हो सकते हैं।

चांद पर पानी का एक और महत्वपूर्ण जरिया सौर हवा (Solar Wind) को माना गया है। इस प्रक्रिया में भी लाखों-करोड़ों सालों तक धीरे-धीरे पानी का संचय हुआ। सोलर विंड के जरिए हाइड्रोजन पार्टिकल लगातार चंद्रमा की सतह से टकराते हैं, जो रासायनिक प्रतिक्रिया के बाद पानी में बदल सकते हैं।

शोध से यह भी पता चलता है कि चांद की सतह और उसका झुकाव समय के साथ बदलने के कारण कुछ गड्ढे जो आज स्थायी छाया में हैं, वो किसी समय में सूर्य की रोशनी में रहे होंगे। यही कारन है कि यहाँ पानी का वितरण असमान है। पुराने गड्ढों में पाई गई सबसे ज्यादा बर्फ इसके लगातार जमा होने का संकेत है।

कंप्यूटर सिमुलेशन और तापमान डेटा के आधार पर वैज्ञानिकों ने ऐसेउन गड्ढों को पहचान लिया है, जो बेहद लंबे समय तक अंधेरे में रहे हैं। इनमें हॉवर्थ क्रेटर दक्षिणी ध्रुव के पास स्थित एक प्रमुख उम्मीदवार है। अनुमान है कि यह 3 अरब वर्ष से अधिक समय से छाया में है और इस जगह को भविष्य में पानी की खोज के लिए सबसे मुनासिब समझा जा रहा है।

इस अध्ययन में यूनिवर्सिटी ऑफ़ कोलोराडो (University of Colorado Boulder) के शोधकर्ताओं ने कंप्यूटर सिमुलेशन और चंद्र टोही ऑर्बिटर (Lunar Reconnaissance Orbiter) के (Diviner) इंस्ट्रूमेंट से प्राप्त तापमान डेटा का इस्तेमाल किया। यह रिसर्च नेचर एस्ट्रोनॉमी जर्नल में पब्लिश हुई है।

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