किसी भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल से सवाल पूछे जाने पर हमें जो जवाब मिलता है उसके पीछे एक कीमत भी चुकानी होती है। इस जवाब को देने में जो ऊर्जा खर्च होती है उसके नतीजे में वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड भी जमा होती है।

इस समस्या पर विशेषज्ञों का कहना है कि यूज़र्स समझदारी से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग करके उत्सर्जन को काफी हद तक घटा सकते हैं। ऐसे में छोटे और सीधे जवाब के साथ केवल ज़रूरी कामों में बड़े और पावरफुल मॉडल्स का प्रयोग और सही मॉडल चुनकर इस नुकसान को काफी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है।
एक्सपर्ट इसका उदाहरण देते हुए बताते हैं कि डीपसेक R1 मॉडल (70B पैरामीटर) से 6 लाख सवाल पूछने पर जितना कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जन होता है उतना लंदन से न्यूयॉर्क तक आने-जाने की फ्लाइट में होता है। वहीँ Qwen 2.5 (72B पैरामीटर) लगभग 19 लाख सवाल उतने ही उत्सर्जन में हल कर सकता है।
एआई मॉडल जब सिलसिलेवार तर्क के साथ जवाब देते हैं, तो साधारण और सीधे उत्तर देने वाले मॉडलों की तुलना में 50 गुना तक अधिक कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जन करते हैं। यह कहना है जर्मनी के शोधकर्ताओं का। साथ ही वह इस बात पर हैरानी भी जताते हैं किइस अतिरिक्त ऊर्जा और उत्सर्जन के बावजूद हर बार बेहतर जवाब नहीं मिलता है।
शोध बताता है कि जिन विषयों में जटिल तर्क की ज़रूरत होती है, जैसे दर्शनशास्त्र या ऐब्स्ट्रैक्ट एल्जेब्रा आदि, उनमें इतिहास जैसे सीधे विषयों की तुलना में 6 गुना ज्यादा उत्सर्जन पाया गया है।
वहीँ यह भी पाया गया कि Cogito नाम का 70 बिलियन पैरामीटर्स वाला एक रीज़निंग मॉडल 84.9% सटीकता तक पहुंचाने में समान आकार वाले concise मॉडलों की तुलना में तीन गुना ज्यादा कार्बन डाई ऑक्साइड रिलीज़ करता है। ऐसे में ज्यादा सटीकता के की खातिर भी यूज़र पर्यावरण के हवाले से भारी कीमत चुका रहे हैं।
