देशभर में बढ़ने वाली पेट्रोल और डीजल की कीमतों का असर सामने आने लगा है। इस बढ़ोतरी ने ऑनलाइन डिलीवरी और ऐप आधारित टैक्सी सेवाओं से जुड़े गिग वर्कर्स की मुश्किलें भी बढ़ा दी हैं। दामों में हुई इस वृद्धि के विरोध में गिग एंड प्लेटफॉर्म सर्विस वर्कर्स यूनियन ने ऐप आधारित सेवाएं बंद रखने का फैसला किया है।
मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि रविवार को होने वाले पांच घंटे के शांतिपूर्ण प्रदर्शन में कई बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से जुड़े कर्मचारियों के शामिल होने की उम्मीद है। इस दौरान स्विगी, जोमैटो, ब्लिंकिट, जेप्टो, ओला, उबर और रैपिडो जैसी सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं।
इस वृद्धि के विरोध में गिग एंड प्लेटफॉर्म सर्विस वर्कर्स यूनियन ने रविवार को दोपहर 12 बजे से शाम 5 बजे तक ऐप आधारित सेवाएं बंद रखने का फैसला किया है। यूनियन की मांग है कि कंपनियां तुरंत प्रति किलोमीटर सर्विस रेट बढ़ाएं। यूनियन ने सरकार और डिजिटल प्लेटफॉर्म कंपनियों से मांग की है कि वर्कर्स के लिए कम से कम 20 रुपये प्रति किलोमीटर का न्यूनतम सर्विस रेट तय किया जाए।
करीब चार साल बाद ईंधन में 3 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोत्तरी पर यूनियन का कहना है कि ईंधन की बढ़ती कीमतों का सीधा असर देश के लगभग 1.2 करोड़ गिग वर्कर्स पर पड़ेगा, जिनकी रोजी-रोटी मोटरसाइकिल और स्कूटर पर निर्भर है।
एलपीजी संकट के चलते यह सेक्टर पहले से ही प्रभावित था। अब पेट्रोल डीज़ल के दामों में होने वाली वृद्धि ने भी गिग वर्कर्स की परेशानियां बढ़ा दी हैं। गैस की कमी के चलते कई रेस्तरां और क्लाउड किचन ने अपनी सेवाएं सीमित कर दी हैं या अस्थायी रूप से बंद हैं।
फूड डिलीवरी का कारोबार भी इसे बुरी तरह प्रभावित हुआ है। इस बीच ऑर्डरों में 50 से 70 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई है। ऐसे में उन डिलीवरी कर्मचारियों की आय प्रभावित हुई है, जिनकी कमाई अधिक ऑर्डर मिलने पर मिलने वाले प्रोत्साहन से जुड़ी है।
मीडिया को अपनी प्रतिक्रिया देते हुए गिग एंड प्लेटफॉर्म सर्विस वर्कर्स यूनियन की अध्यक्ष सीमा सिंह का कहना है कि महंगाई और भीषण गर्मी के बीच ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी श्रमिकों पर अतिरिक्त बोझ डाल रही है। यूनियन की तरफ से सरकार और डिजिटल प्लेटफॉर्म कंपनियों से मांग की गई है कि वर्कर्स के लिए कम से कम 20 रुपये प्रति किलोमीटर का न्यूनतम सर्विस रेट तय किया जाए।
रिपोर्टसे पता चला है कि इस संकट का सबसे ज्यादा असर महिला गिग वर्कर्स, डिलीवरी एजेंटों और ड्राइवरों पर पड़ रहा है। यह लोग सख्त मौसम और भारी ट्रैफिक के बीच रोजाना 10 से 14 घंटे तक काम करते हैं। यूनियन की ओर से दी गई चेतावनी में यह भी कहा गया है कि अगर ईंधन और वाहन रखरखाव के बढ़ते खर्च के मुकाबले आय में सुधार नहीं हुआ, तो बड़ी संख्या में लोग इस क्षेत्र को छोड़ सकते हैं।