हर शिकार के लिए एक नया गमछा खरीदता था ये रिक्शेवाला

देश दुनिया के सीरियल किलर्स #SerialKillers पर आधारित इस विशेष वीकेंड सीरीज़ में आप पिछले दो सप्ताह में 5 कहानियां पढ़ चुके हैं. इस हफ्ते पढ़िए भारत के एक ऐसे सीरियल किलर की कहानी जिसने अपनी एक लत के लिए खेला कत्ल का खेल.

फरीदाबाद की एक इंडस्ट्री में काम करने वाला सीकरी निवासी रवि ओल्ड फरीदाबाद पुलिस चौकी के पास खड़ा था. साल 2014 की एक रात करीब सवा नौ बजे का वक्त था, तभी एक रिक्शे वाला रवि के पास पहुंचा. रवि रिक्शे में बैठ गया और कहा कि उसे एक बीयर खरीदना है तो किसी वाइन शॉप पर चले. थोड़ी दूर जाकर रिक्शा एक सुनसान सी जगह पर रुका. रिक्शे वाले ने कहा कि वह दो मिनट में हल्का होकर आता है. रवि इंतज़ार कर रहा था कि तभी उसके गले में पीछे से एक गमछा पड़ा, जो कसता चला गया.
उस गमछे की जकड़ और बढ़ती गई और कुछ ही देर बाद रवि का दम घुटने लगा और उसकी आंखें बंद हो गईं. रवि के निढाल होते ही वह गमछा उसके गले से हटा. रिक्शे वाले ने वह गमछा वहीं फेंका और रवि की जेब से पर्स और मोबाइल फोन लेकर चला गया. थोड़ी देर बाद रवि को होश आ गया. बस यही उस रिक्शे वाले की गलती थी कि वह रवि को मरा हुआ समझकर छोड़ गया. यही गलती कुछ ही दिनों में इस किलर को ले डूबी.

रवि को समझा गया हत्यारा
रिक्शे वाले किलर के हाथों बाल-बाल बचे रवि को कुछ ही दिनों में पुलिस ने पकड़ लिया. पुलिस का मानना था कि रवि ही वह सीरियल किलर है, जो पिछले तीन महीनों से एक के बाद एक हत्याएं कर रहा है. रवि ने किसी तरह पुलिस को यकीन दिलाया कि वह सीरियल किलर नहीं, बल्कि उस किलर का एक शिकार था जो हमले में बाल-बाल बचा.
अस्ल में, उस रिक्शे वाले किलर ने रवि की जेब से जो पर्स चुराया था, उसमें से पैसे निकालकर वह पर्स फरीदाबाद के सेक्टर 15 में निर्माणाधीन एक मेट्रो स्टेशन के नज़दीक फेंक दिया था. इस पर्स में रवि का फोटो भी था और इसी को सुराग मानते हुए पुलिस रवि तक पहुंच गई थी. लेकिन रवि की गवाही के बाद यह एक हद तक साफ हो गया था कि सीरियल किलर तक पहुंचने का महीनों से चल रहा पुलिस का सफर अभी खत्म नहीं हुआ.

एक और शिकार बचने में हुआ कामयाब
कुछ ही दिनों बाद रिक्शे वाले उस किलर के हाथों एक और व्यक्ति तेजेंद्र बच गया. तेजेंद्र भी उसी तरह लूट का शिकार हुआ था जैसे रवि. तेजेंद्र पुलिस के पास पहुंचा और उसने बताया कि उसे बेहोशी की हालत में वह किलर एनआईटी इलाके में फेंक कर उसका सामान लूटकर फरार हो गया. तेजेंद्र से पुलिस को एक खास बात यह पता चली कि वह रिक्शे वाला पूरे समय अपना मुंह गमछे से ढंके रहता था. इसके अलावा उसकी कद काठी के बारे में भी उसने जानकारी दी.

अब गमछा था किलर की पहचान
तेजेंद्र की गवाही के बाद साफ था कि वह किलर अपने दस्तखत के तौर पर गमछा अपने शिकार के पास छोड़ देता है. तीन महीनों में हुईं 5 हत्याओं में मृतकों के पास से गमछा ज़रूर बरामद किया गया था. एकाध केस में यह पता चल चुका था कि मृतक गमछा नहीं पहनता था लेकिन यह अब तक साफ नहीं था कि गमछा मृतकों का ही था, कातिल का या इत्तेफाकन किसी का. रवि और तेजेंद्र की गवाही के बाद साफ था कि यह गमछा उस किलर की पहचान है.

रिक्शा चलाने वाला एक शख्स जो गमछे से मुंह ढंके रहता है, ऐसे आदमी की खोज में पुलिस भटक रही थी तभी एक ऐसे व्यक्ति के संदिग्ध होने की टिप मिली. एक पुलिस वाला सिविल ड्रेस में उस रिक्शे वाले के पास पहुंचा और सवारी के तौर पर उसे कहीं चलने को कहा. रिक्शे वाले ने रिक्शे को एक सुनसान जगह पर उसी बहाने से रोका. पुलिस वाला चौकन्ना था कि उस पर पीछे से हमला होगा. हमला हुआ, गले में गमछा डाला गया लेकिन कुछ ही पलों में पुलिस वाले ने जवाब देते हुए उस रिक्शे वाले को काबू कर लिया और यह गमछा किलर पुलिस की गिरफ्त में आ गया.

इस गमछा किलर का एक खास पैटर्न था. पहला तो गमछा उसका दस्तखत था और वह हर शिकार के लूटे पैसों से एक नया गमछा खरीदता था. दूसरा वह फरीदाबाद में तकरीबन हर 20 दिन के बाद किसी को शिकार बनाता था. तीसरी बात यह थी कि वह सुनसान जगह पर हमला करने के बाद लाश को किसी वीरान जगह या झाड़ियों में फेंक देता था. इसके साथ ही वह शिकार के पास से कीमती चीज़ें चुराता था.

गमछा किलर की कहानी : गांजा, सुल्फा, शराब
गमछे वाले सीरियल किलर के रूप में बदनाम होने वाला यह शख़्स उत्तर प्रदेश के बदायूं ज़िले का रहने वाला रिंकू था. जनवरी 2015 में जब इसे पकड़ा गया तब इसकी उम्र 27 साल थी. नशेड़ियों की संगत में नशे का आदी हो चुका था और गांव में वह उतना पैसा नहीं कमा पाता था जिससे नशे की तलब पूरी हो सके. इसी कारण से गरीब घर का लड़का रिंकू पैसे कमाने 2009 के आसपास दिल्ली आया था. यहां उसने दोस्तों की मदद से रिक्शे का इंतज़ाम कर उन्हीं की तरह रिक्शा चलाना शुरू किया. लेकिन इससे भी उसे ज़रूरत पूरी करने जितने पैसे नहीं मिल पा रहे थे.

नशे के गुलाम रिंकू को जिस दिन सवारी न मिलती तो वह नशा नहीं कर पाता और बिना नशे के वह बेचैन हो उठता था. इसी बेचैनी में उसने जुर्म की दुनिया में एंट्री ली और अपने दो दोस्तों की मदद से दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में 2009 से 2012 तक तीन कत्लों को अंजाम दिया. उसे शक की बिना पर पुलिस ने पकड़ा भी लेकिन वह 2014 में ज़मानत पर रिहा हो गया. इसके बाद रिंकू फिर अपने गांव गया लेकिन तीन महीनों से ज़्यादा वह गांव में रह नहीं सका और नशे की ज़रूरत उसे फरीदाबाद ले गई.

दिल्ली में रिंकू पुलिस की नज़र में आ चुका था इसलिए फरीदाबाद चला गया. शुरुआत में उसने वहां अपनी बहन की मदद से कुछ दिन बिताए फिर एक रिक्शे का इंतज़ाम कर लिया. और रिक्शे वाले गमछे किलर के रूप में यहां रिंकू ने तीन महीनों के भीतर पांच हत्याओं को अंजाम दिया.

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