ये देश के इतिहास की सबसे बड़ी और पहली डिजिटल जनगणना है

लगभग पांच साल के अंतराल के बाद भारत में दुनिया की सबसे बड़ी जनगणना शुरू हो गई है। इस जनगणना की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि लगभग एक सदी बाद जाति की गिनती भी शामिल है। यह देश की अब तक की सबसे बड़ी और पहली डिजिटल जनगणना होगी, जो दो चरणों में आयोजित की जाएगी।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह प्रक्रिया सिर्फ़ आबादी की गिनती नहीं है, बल्कि एक ज़रूरी राजनीतिक और सामाजिक कदम भी साबित हो सकता है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 2027 में होने वाली भारत की अगली जनगणना के लिए 11,718.24 करोड़ रुपये की कुल लागत को मंजूरी दी है। इस तरह से लगभग 97 रूपये प्रति व्यक्ति लागत वाली इस प्रक्रिया में 30 लाख से ज़्यादा सरकारी अधिकारी देश भर के लगभग 1.4 बिलियन लोगों का डेटा इकट्ठा करेंगे।

बताते चलें कि भारत में पिछली जनगणना 2011 में हुई थी, जबकि अगली जनगणना 2021 में होनी थी, लेकिन कोरोना महामारी के कारण इसमें देरी हुई। इस जनगणना में पहली बार ‘स्व-गणना’ (self-enumeration) का विकल्प भी उपलब्ध होगा। इसमें डेटा संग्रह के लिए मोबाइल ऐप और मॉनिटरिंग के लिए एक सेंट्रल पोर्टल का उपयोग किया जाएगा।

अधिकारियों द्वारा साझा की गई जानकारी के अनुसार, जनगणना देश के 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों में की जाएगी, जिसमें 7,000 से ज़्यादा शहर और लगभग 640,000 गाँव शामिल हैं। लद्दाख, जम्मू और कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे बर्फ से ढके क्षेत्रों के लिए संदर्भ तिथि पहली अक्टूबर, 2026 निर्धारित की गई है। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, गोवा, कर्नाटक, लक्षद्वीप, मिजोरम, ओडिशा, सिक्किम, एनडीएमसी क्षेत्र और राष्ट्रीय राजधानी के दिल्ली छावनी बोर्ड सहित ग्यारह राज्य और केंद्र शासित प्रदेश एचएलओ प्रक्रिया को अंजाम देंगे।

यह भारत की पहली पूरी तरह से डिजिटल जनगणना होगी, अधिकारी मोबाइल ऐप के ज़रिए 33 सवालों वाली जानकारी इकट्ठा करेंगे, जबकि नागरिक भी अपनी जानकारी ऑनलाइन डाल सकेंगे। जनगणना अगले साल 31 मार्च तक पूरी होने की उम्मीद है। यह जनगणना दो फ़ेज़ में होगी। इनमें पहला फ़ेज़ घरों और बेसिक सुविधाओं, जैसे घर, पानी, बिजली और इंटरनेट एक्सेस की जानकारी से जुड़ा होगा। जनगणना का दूसरा फ़ेज़ शिक्षा, रोज़गार, माइग्रेशन, जन्म दर और जाति की जानकारी से संबंधित है।

अगर इसके महत्व पर प्रकाश डाला जाए तो विशेषज्ञों का कहना है कि जनगणना से सरकार को आबादी के ट्रेंड, शहरी-ग्रामीण बंटवारे, रोज़गार और सामाजिक हालात को समझने में मदद मिलती है, और इसी डेटा के आधार पर वेलफेयर प्रोजेक्ट, रिसोर्स एलोकेशन और डेवलपमेंट पॉलिसी बनाई जाती हैं।

इस जनगणना को इसलिए भी ज़रूरी माना जा रहा है क्योंकि इसके बाद चुनावी इलाकों का नया डिलिमिटेशन होने की उम्मीद है। ऐसे में एक महत्वपूर्ण मुद्दा उत्तर और दक्षिण की आबादी से जुड़ा है। दक्षिण भारत के राज्यों को डर है कि आबादी के आधार पर नया बंटवारा उत्तरी इलाकों की पॉलिटिकल पावर को और बढ़ा सकता है।

इसके अलावा, पार्लियामेंट में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें रिज़र्व करने का कानून भी नई जनगणना और डिलिमिटेशन के अधीन है।

गौरतलब है कि भारत में आखिरी पूरी जाति जनगणना 1931 में हुई थी। आज़ादी के बाद, सरकार ने सामाजिक बंटवारे से बचने के लिए 1951 में जाति जनगणना पर पाबन्दी लगा दी थी। इस रोक से निचली जातियों और आदिवासी ग्रुप्स का सिर्फ़ सीमित डेटा इकट्ठा किया गया।

जाति की गिनती का विरोध करने वाली सत्ता ने इस बार राजनीतिक दबाव के बाद इसे जनगणना में शामिल करने का ऐलान किया गया है। ऐसे में समर्थकों का तर्क है कि सही सामाजिक न्याय और आरक्षण पॉलिसी बनाने के लिए जाति का डिटेल्ड डेटा ज़रूरी है, जबकि विरोधियों का कहना है कि इससे समाज में बंटवारा और मज़बूत हो सकता है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, भारत के रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त मृत्युंजय कुमार नारायण ने आश्वासन दिया है कि डेटा सुरक्षा के लिए आवश्यक उपाय किए गए हैं। उन्होंने नागरिकों से सर्वेक्षकों को सटीक और सही जानकारी प्रदान करने का आग्रह किया।

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