भारत के इस गांव ने बताया कि अब प्लास्टिक का कचरा बोझ नहीं बल्कि संसाधन है

जहाँ कभी प्लास्टिक कचरा का ढेर था, आज वहां सड़क बन गई है। कभी जिस काम को गन्दा कहा जाता था, आज वही सम्मान का जरिया है। और जो गाँव कभी पीछे छूट गए थे अब वही प्रगति का रास्ता दिखा रहे हैं।

भारत के इस गांव ने बताया कि अब प्लास्टिक का कचरा बोझ नहीं बल्कि संसाधन है

पश्चिम बंगाल के मयनागुड़ी के एक छोटे से गाँव ने नई शुरुआत करके इस गांव का नक्शा ही बदल दिया है। इस गांव का कूड़ा अब बेकार नहीं, बल्कि बहुमूल्य संसाधन बन गया है। इस नई पहल ने यहाँ की सड़कों का सफर आसान कर दिया है। लोगों को मंज़िलों तक पहुँचाने वाली सड़कें उम्मीद और नवाचार का रास्ता बन गई हैं।

इस बदलाव में राज्य सरकार के साथ यूनिसेफ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहा है। साल 2023-24 से ODF Plus कार्यक्रम के अंतर्गत प्रशिक्षण, निगरानी और टूलकिट्स के ज़रिए यह बदलाव ज़मीनी स्तर पर सम्भव हो पाया है। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट इस पर प्रकाश डालती है।

भारत के पश्चिम बंगाल राज्य के मयनागुड़ी में प्लास्टिक कचरे को सड़कों में बदलने की एक अनोखी पहल, न केवल पर्यावरणीय समाधान के रूप में उभरकर सामने आई है, बल्कि ग्रामीण आजीविका और स्वच्छता का भी प्रतीक बन गई है। इस परिवर्तन में यूनीसेफ़, राज्य सरकार के साथ मिलकर कचरा प्रबंधन, प्रशिक्षण और निगरानी के ज़रिए इस मॉडल को स्थाई और विस्तार योग्य बनाने में मदद कर रहा है।

इन सड़कों की नींव में उस प्लास्टिक का इस्तेमाल किया गया है जो कभी नदियों में बहता था, गलियों में उड़ता था, और पर्यावरण के लिए ख़तरा बना हुआ था। यही प्लास्टिक का कचरा अब मज़बूत सड़कों में बदल दिया गया है, जिससे न केवल साफ़-सफाई बढ़ी है बल्कि रोज़गार और सम्मान के साथ सुविधा भरी राह भी खुली है। कभी इस गांव की सड़कें इतनी ख़राब हुआ करती थीं कि इन पर पैदल या किसी भी सवारी से चल पाना दूभर हुआ करता था। मगर अब यही रास्ते सुगम है।

सोच बदलने वाली शुरूआत
2024 के अक्टूबर महीने में जलपाईगुड़ी ज़िले के खगराबाड़ी-द्वितीय पंचायत में एक नई यह पहल शुरू हुई। ब्लॉक स्तर पर स्थापित प्लास्टिक कचरा प्रबंधन (PWM) इकाई अब हर दिन लगभग 600 किलोग्राम प्लास्टिक एकत्र करने लगी। यह काम 15 ग्राम पंचायतों और एक नगरपालिका से किया गया।

इनमें ज़्यादातर प्लास्टिक लो डेंसिटी पॉलीइथिलीन (LDPE) है, जो पॉलीथीन की थैलियों, चिप्स के पैकेट और फूड रैपर्स में इस्तेमाल होता है। यही प्लास्टिक जो पहले वातावरण को गन्दा करता था, अब सड़कों को मज़बूती प्रदान कर रहा है।

आज मयनागुड़ी की गलियों में केवल साफ़-सफ़ाई नहीं दिखती, वहाँ एक खामोश क्रान्ति की आहट भी महसूस होती है। यह क्रान्ति है सोच की, रोज़गार की, और उम्मीद की।

जिस काम को कभी गन्दगी से जुड़ा मानकर लोग दूर भागते थे, अब वही लोगों के लिए सम्मान और स्थिर आय का स्रोत बन गया है। इस इकाई में पाँच पुरुष और दो महिलाएं काम करते हैं और इन्हें हर दिन ₹202 की मज़दूरी मिलती है।

यहाँ काम करने वाली 35 वर्षीय चैताली मोडक दो बच्चों की माँ है। वह जब इस काम से जुड़ीं तो उनके रिश्तेदारों और पड़ोसियों ने उन्हें ताने दिए। लेकिन आज उनका कहना है कि अगर इस गन्दगी वाले काम से समाज में सुधार होता है और मेरे बच्चों का भविष्य बेहतर होता है, तो यह शर्म नहीं बल्कि गर्व की बात होगी।

इस सोच ने धीरे-धीरे बाक़ी लोगों की सोच को बदला। अब वहाँ कचरा फेंका नहीं जाता, बल्कि उसे अलग किया जाता है। सफ़ाई अब सिर्फ सरकारी योजना नहीं, बल्कि सामुदायिक ज़िम्मेदारी बन गई है।

जलपाईगुड़ी ज़िला परिषद के ADM, रौनक अग्रवाल बताते हैं कि यह परियोजना सिर्फ प्लास्टिक निपटान ही नहीं, बल्कि पर्यावरणीय चुनौती को अवसर में बदलने की मिसाल है। यह सड़कों को टिकाऊ, ग्रामीण आवाजाही को बेहतर करने और नदी-झीलों को प्रदूषण मुक्त बनाने का तरीक़ा बन गई है।

इस पायलट योजना के तहत अब तक प्लास्टिक के पुनः उपयोग से 244 किलोमीटर सड़कों का निर्माण किया जा चुका है। प्लास्टिक कचरा प्रबंधन(PWM) इकाइयों के संचालन हेतु 221 लोगों को प्रशिक्षण दिया गया है, और 1331 सफ़ाईकर्मियों को भी विशेष प्रशिक्षण देकर उनकी भूमिका को मज़बूत किया गया है।

विस्तार की योजना
आज यह कहानी सिर्फ़ एक गाँव की नहीं है। इस मॉडल को पूरे देश में दोहराया जा सकता है। अब कचरा बोझ नहीं बल्कि संसाधन है। यह बदलाव ज़मीन से शुरू होता है।

पश्चिम बंगाल का यह प्रयोग दिखाता है कि सतत विकास केवल सरकारों के भरोसे नहीं होता। वह समुदायों, बच्चों, और चैताली जैसी महिलाओं की मेहनत से साकार होता है।

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