विशेषज्ञों का मानना है कि शुरुआती उम्र में स्क्रीन के अधिक संपर्क से बच्चों के मस्तिष्क विकास और सामाजिक व्यवहार पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
‘एक साल से कम उम्र के बच्चों में बहुत ज़्यादा स्क्रीन टाइम, तीन साल की उम्र तक ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) के बढ़े हुए खतरे से सम्बंधित हो सकता है।’ यह नतीजा अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में किए गए एक अध्ययन में सामने आया है।
ऑटिज्म क्या है और क्यों इससे सचेत रहना चाहिए
एएसडी यानी ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर एक जटिल न्यूरोडेवलपमेंटल स्थिति है, जिसमें बच्चों के व्यवहार, संचार और सामाजिक संपर्क में बदलाव देखा जा सकता है। अकसर 12 से 18 महीने की उम्र में इसके संकेतों को महसूस किया जा सकता हैं। यदि समय पर इसे पहचान लिया जाए तो ज़रूरी है कि इसके लिए हर मुमकिन हस्तक्षेप करें।
2025 के सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन का अनुमान के अनुसार, लगभग हर 31 में से एक व्यक्ति में एएसडी पाया जाता है। यह आंकड़ा बताता है कि पब्लिक हेल्थ सिस्टम के लिए सतर्कता और जागरूकता की बहुत बड़े पैमाने पर जरूरत है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, एम्स की पीडियाट्रिक्स विभाग की प्रोफेसर डॉक्टर शेफाली गुलाटी का कहना है कि कई शोध और मेटा-एनालिसिस में पाया गया है कि जिन बच्चों में स्क्रीन एक्सपोज़र जल्दी शुरू होता है और स्क्रीन टाइम अधिक होता है, उनमें ऑटिज्म के लक्षण ज्यादा देखे जाते हैं।
इस अध्ययन में यह भी यह सामने आया कि ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों में स्क्रीन टाइम की शुरुआत कम उम्र में हुई थी। साथ ही, लड़कों में इसकी दर अधिक देखी गई, हालांकि लड़कियों में भी लक्षण स्पष्ट रूप से मौजूद थे।
स्क्रीन टाइम संबंधी गाइडलाइंस
विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों के स्वस्थ विकास के लिए स्क्रीन टाइम को सीमित रखना बहुत ज़रूरी है। अमरीका और इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स की गाइडलाइंस के अनुसार 18 महीने से कम उम्र के बच्चों को स्क्रीन से पूरी तरह दूर रखना चाहिए। 18 महीने से 6 वर्ष तक के बच्चों के लिए सीमित और उद्देश्यपूर्ण स्क्रीन उपयोग की सलाह दी जाती है, जबकि 7 वर्ष से अधिक आयु के बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम को अधिकतम 2 घंटे तक सीमित रखने की अनुशंसा की गई है।
इसकी रोकथाम के पहलु पर, विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों को मोबाइल या टीवी के जरिए व्यस्त रखने के बजाय माता-पिता के साथ सीधा संवाद बच्चे के मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास के लिए ज्यादा जरूरी है।
ऑटिज्म की पहचान
विशेषज्ञों के मुताबिक़, इस समस्या की शुरुआत 2 से 3 साल की उम्र में होती है, हालांकि 18 महीने के बाद इसके संकेत देखे जा सकते हैं। इसकी पहचान के लिए कोई निश्चित मेडिकल जाँच नहीं है। अकसर पहचान बच्चे के व्यवहार, संवाद क्षमता और सामाजिक प्रतिक्रिया के आधार पर इसके संकेतों से समस्या को समझा जा सकता है।
इसके बारे में विशेषज्ञों का कहना है कि जागरूकता और समय पर हस्तक्षेप से ऑटिज्म से जुड़ी चुनौतियों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। एक्सपर्ट इस बात पर भी ज़ोर देते हैं कि शुरुआती वर्षों में अच्छा वातावरण, सीमित स्क्रीन टाइम और परिवार के साथ अधिक समय बच्चों के स्वस्थ विकास के लिए बेहद जरूरी है।