दुनिया की 44 प्रतिशत महिलाएँ और लड़कियाँ अब भी क़ानूनी सुरक्षा से वंचित हैं: यूएन रिपोर्ट

हर साल 3 मई को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है। यूएन संस्था (UN Women) और TheNerve सहित अन्य साझीदारों ने महिला सशक्तिकरण संबंधी संयुक्त रिपोर्ट की स्थिति पर गम्भीर चिन्ता व्यक्त की गई है.

यूएन समाचार के अनुसार, सार्वजनिक जीवन में सक्रिय महिलाओं, विशेषकर महिला पत्रकारों और मीडिया पेशेवरों के विरुद्ध ऑनलाइन मंचों पर हिंसा की ख़बरों में दोगुना उछाल आया है। इस हिंसा के नतीजे में पाया गया कि उनके स्वास्थ्य पर गम्भीर असर हो रहे हैं।

इस रिपोर्ट से सामने आने वाली बातों से पता चलता है कि महिला मानवाधिकार पैरोकारों, कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, मीडिया कर्मियों और अन्य सार्वजनिक संचार से जुड़े पेशों से जुड़ी 12 प्रतिशत महिलाओं ने बताया कि उनके साथ बिना सहमति के ली गईं निजी तस्वीरें साझा की गई हैं, जिनमें अन्तरंग या यौन सामग्री भी शामिल है।

रिपोर्ट के मुताबिक़, 6 प्रतिशत महिलाओं ने बताया कि वे “डीपफ़ेक” का शिकार हुई हैं, जबकि लगभग हर 3 में से 1 महिला को डिजिटल माध्यमों के ज़रिए अनचाही यौन टिप्पणियाँ या प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं।

रिपोर्ट में बताया गया है कि इस तरह का दुरुपयोग अक्सर जानबूझकर और संगठित तरीके़ से किया जाता है, जिसका उद्देश्य सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की आवाज़ को दबाना और उनकी पेशेवर विश्वसनीयता तथा व्यक्तिगत प्रतिष्ठा को नुक़सान पहुँचाना होता है।

रिपोर्ट में 19 प्रतिशत महिलाओं ने बताया कि ऑनलाइन हिंसा के कारण वे अपने पेशेवर काम में भी आत्म-संयम बरतती हैं। करीब 41 प्रतिशत महिला प्रतिभागियों ने कहा कि वे सोशल मीडिया पर ख़ुद को सैंसर (self-censor) करती हैं ताकि उत्पीड़न से बच सकें।

महिला पत्रकार और मीडियाकर्मी ज़्यादा प्रभावित
महिला पत्रकारों और मीडिया कर्मियों की बात करें तो स्थिति और भी गम्भीर है। इस समूह की 45 प्रतिशत महिलाओं ने 2025 में सोशल मीडिया पर आत्म-सैंसरशिप की बात कही, जो 2020 की तुलना में 50 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाती है। वहीं लगभग 22 प्रतिशत ने बताया कि वे अपने काम में भी आत्म-सैंसरशिप अपनाने को मजबूर हैं।

अन्य महत्वपूर्ण रुझान यह भी दिखाते हैं कि महिला पत्रकारों और मीडिया कर्मियों के बीच क़ानूनी कार्रवाई और क़ानून प्रवर्तन एजेंसियों को रिपोर्ट करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है।

साल 2020 की तुलना में 2025 में, दोगुनी महिलाओं ने ऑनलाइन हिंसा की घटनाओं की रिपोर्ट पुलिस में दर्ज कराई।

वहीं, लगभग 14 प्रतिशत अब दोषियों, सहयोगियों या अपने नियोक्ताओं के विरुद्ध क़ानूनी कार्रवाई कर रही हैं, जो 2020 के 8 प्रतिशत से अधिक है. यह जवाबदेही को लेकर बढ़ती जागरूकता और प्रयासों को दर्शाता है।

मानसिक स्वास्थ्य पर असर
यह हिंसा महिलाओं के स्वास्थ्य और मानसिक कल्याण पर भी गम्भीर प्रभाव डाल रही है। रिपोर्ट के अनुसार, सर्वेक्षण में शामिल लगभग एक चौथाई महिला पत्रकारों और मीडियाकर्मियों को ऑनलाइन हिंसा से जुड़ी चिन्ता (anxiety) या अवसाद (depression) से ग्रस्त पाया गया हैं, जबकि लगभग 13 प्रतिशत ने सदमे के हालात – (PTSD) से पीड़ित होने की बात कही है।

लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन
यूएन वीमैन की “महिलाओं के विरुद्ध हिंसा की समाप्ति” विभाग की प्रमुख कलिओपी मिंगेरू ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) ने दुर्व्यवहार को और आसान तथा अधिक हानिकारक बना दिया है, जिससे लोकतांत्रिक अधिकारों के क्षरण और डिजिटल मंचों पर संगठित स्त्री-विरोधी प्रवृत्तियों के बीच वर्षों से हासिल किए गए अधिकार कमज़ोर हो रहे हैं।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि ऑनलाइन हिंसा के विरुद्ध क़ानूनी सुरक्षा में बड़ी खाइयाँ मौजूद हैं।

विश्व बैंक के अनुसार, दुनिया के 40 प्रतिशत से भी कम देशों में, साइबर उत्पीड़न या साइबर स्टॉकिंग यानि महिलाओं पर नज़र रखे जाने से उनकी सुरक्षा के लिए क़ानून मौजूद हैं।

इसके परिणामस्वरूप, दुनिया की 44 प्रतिशत महिलाएँ और लड़कियाँ यानि लगभग 1.8 अरब महिलाएँ अब भी क़ानूनी सुरक्षा से वंचित हैं।

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