अभिनेता मकरंद देशपांडे बीकानेर थिएटर फेस्टिवल में अपने नाटक ‘पियक्कड़’ का मंचन करने पहुंचे थे। इस अवसर पर उन्होंने नाटक और फिल्म के हवाले से बात की और बताया की दोनों में कोई स्पर्धा नहीं हो सकती।

इस अवसर पर ईटीवी को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने अपने विचार साझा किए। ‘सत्या’, ‘कंपनी’ और ‘मकड़ी’ जैसी हिंदी से अपने दर्शकों के बेच एक ख़ास पहचान बनाने वाले मकरंद देशपांडे के लिए आज भी थियेटर पहली जबकि सिनेमा दूसरी चॉइस है। रंगमंच को अपने लिए सांस की तरह बताते हुए वह कहते हैं कि जिस तरह से जीवन जीने के लिए सांस लेना जरूरी है, मेरे लिए रंगमंच हर एक सांस में है।
मकरंद नाटक को जीवन होने के साथ ही मेडिटेशन और अध्यात्म बताते हैं। फिल्मी दुनिया के बारे में उनका कहना है कि फिल्म में आपको सब कुछ सेट करके दिया जाता है। वह बड़े पर्दे के मुकाबले में नाटक को एक जीवंत कला मानते हैं। उनके लिए आज भी नाटक प्राथमिकता में रहता है। इसकी वजह बताते हुए वह कहते हैं कि नाटक में आपके भाव नजर आते हैं और फिल्मों में उन भावों को तैयार किया जाता है।
एक सवाल के जवाब में वह कहते हैं कि मैं कैरक्टर आर्टिस्ट नहीं हूं। यह खुद को ही बताना पड़ता है। हर भूमिका के अनुसार खुद को ढालना जरूरी है।
मकरंद थियेटर की दुनिया से 1990 से जुड़े हुए हैं और बतौर आर्टिस्ट वह भविष्य में किसी राक्षस या संत की भूमिका करने की ख्वाहिश रखते हैं। फ़िल्मी दुनिया में कंट्रोवर्सी के हवाले अभिनेता का कहना है कि चर्चा कर मार्केटिंग करवाने का प्रयास होता है, लेकिन कथानक अच्छा है, तो फिर किसी भी तरह की कोई भी कंट्रोवर्सी मार्केटिंग की जरूरत नहीं है।
