यह संकट हर दिन बढ़ता जा रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि इसका समाधान क्या है? इससे बचने के लिए सरकारी स्तर पर क्या प्रयास हो रहे हैं?
प्लास्टिक की सबसे बड़ी समस्या है इसका नॉन-बायोडिग्रेडेबल होना यानी ये मिट्टी में मिलता नहीं है। आप पानी की एक बोतल खरीदने के बाद उसे फेंक देते हैं। यही बोतल प्रकृति में घुलने में 450 से 1000 साल तक लेती है। यानी मात्र कुछ मिनट की सुविधा के बदले इंसान सैकड़ों सैलून का ज़हर पृथ्वी को वापस करता है।
भारत में साल 2021 में 9.3 मिलियन टन प्लास्टिक कचरे में से 5.8 मिलियन टन जलाया गया या लैंडफिल में डाला गया। पिछले वर्षों में होने वाला साइंस मैगज़ीन का एक अध्ययन बताता है कि आज हमारी मिट्टी पानी और हवा में प्लास्टिक के बेहद छोटे कण शामिल हो चुके हैं। यह माइक्रोप्लास्टिक इंसान के खून में भी मिलकर हमारे अंगों तक पहुँच बना चुके हैं। इंसान के अलावा समुद्री जीव जिनमें मछलियाँ, कछुए, ह्वेल आदि भी प्लास्टिक खाकर मर रहे हैं। जलाए जाने पर यह प्लास्टिक ज़हरीली गैस बनाती है।
मानवता ने हाल के वर्षों में हर साल अनुमानित 400 मिलियन टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न किया है, जिसमें अकेले 2025 में वैश्विक प्लास्टिक कचरे का स्तर 225 मिलियन टन तक पहुंच गया था। विशेषज्ञों के अनुसार, इससे नाज़ुक पारिस्थितिकी तंत्रों को नुक़सान पहुँचता है और माइक्रोप्लास्टिक्स जैसे प्लास्टिक में मौजूद हानिकारक रसायनों व प्रदूषकों के लोगों के सम्पर्क में आने से, सम्भावित स्वास्थ्य जोखिम उत्पन्न होते हैं।
हालाँकि रिसाइकिल इसका एक हल है मगर इसकी मात्रा बेहद कम होने से इस हल को कारगर नहीं कह सकते। इस प्रक्रिया में प्रयोग के बाद प्लास्टिक रीसाइक्लिंग सेंटर पहुंचती है। यहाँ इसे क्रश और फिर मेल्ट किया जाता है। इसके छोटे-छोटे फ्लेक्स बनाए जाते हैं। इसकी मदद से कई उपयोगी सामान जैसे टी-शर्ट, कालीन और नई बोतलें बनती हैं। मगर अफ़सोस की बात यह है कि दुनिया में केवल 9 प्रतिशत प्लास्टिक ही रीसाइकिल हो पाती है। साल 2022 में 400 मिलियन टन में से मात्र 36 मिलियन टन रीसाइकिल हो पाई थी।
दरअसल प्लास्टिक का संकट जितना बड़ा नज़र आता है, असल में यह उससे भी कहीं ज्यादा बड़ा है। हालाँकि निजी स्तर पर आदतों में छोटे-छोटे बदलाव के ज़रिए स्थिति को बेहतर बनाया जा सकता हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण बदलाव है प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करना। इसकी क्रम में रियूज यानी एक ही चीज़ का बार-बार प्रयोग भी एक बेहतर हल है। इस्नमेँ तीसरा है रिसाइकिल। इसमें प्लास्टिक को फेंको के बजाए इसे सही तरीके से रीसाइकिल किया जाता है।