ब्रिटिश इजिप्टोलॉजिस्ट हॉवर्ड कार्टर ने साल 1922 में तूतनख़ामेन की भुला दी गई कब्र की खोज की थी। वर्तमान में दुनिया के कई शहरों में दशकों तक प्रदर्शित होने के बाद तूतनख़ामेन का सोने का मुखौटा, सिंहासन और उनके साथ दफ़न किए गए हज़ारों सामान जो एक ख़ज़ाने की तरह पहली बार एक ही जगह दिखाए जा रहे हैं।

बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, गीज़ा के महान पिरामिड के समीप बना ग्रैंड इजिप्शियन म्यूज़ियम इस प्राचीन दुनिया का आख़िरी बचा अजूबा है। यह म्यूज़ियम अब लोगों के लिए खुल रहा है।
पहली नवंबर 2025 को इसका उद्घाटन समारोह है। इस समारोह में को ‘वन टाइम पब्लिक हॉलिडे’ के तौर पर घोषित किया गया है। जर्मनी के राष्ट्रपति फ़्रैंक-वॉल्टर स्टाइनमायर और बेल्जियम के राजा फ़िलिप सहित दुनिया के क़रीब साठ नेता इस आयोजन में शिरकत करेंगे। आयोजन काहिरा के प्रमुख चौराहों पर लगे बड़े स्क्रीन पर लाइवस्ट्रीम किए जाने के साथ टिकटॉक पर भी दिखाया जाएगा।
रिपोर्ट के मुताबिक़, इस म्यूज़ियम का निर्माण 120 एकड़ यानी करीब 0.5 वर्ग किलोमीटर में फैला है जो फ्रांस के लूवर म्यूज़ियम से लगभग दोगुना बड़ा है। इसमें 70 हज़ार से एक लाख तक पुरावशेष प्रदर्शित किए जाएंगे। यहाँ का आकर्षण होगा राजा तूतनख़ामेन की क़ब्र से मिली कई अनदेखी धरोहरें।
म्यूज़ियम में राजा तूतनख़ामेन के खज़ानों के अलावा भी कई और ऐतिहासिक वस्तुएं रखी गई हैं। इनमें म्यूज़ियम के मुख्य हॉल में आने वालों का स्वागत करती रामेसेस द ग्रेट की 3 हज़ार 200 साल पुरानी विशाल प्रतिमा शामिल है।
मैनचेस्टर म्यूज़ियम में मिस्र और सूडान के क्यूरेटर डॉक्टर कैंपबेल प्राइस कहते हैं, “मुख्य गैलरियां भी बहुत सुन्दर हैं। हर चीज़ को इतनी जगह दी गई है कि वह ख़ुद को पूरी तरह दिखा सकें। मुझे यह अनुभव गहराई से छू गया। यह भावनात्मक पल था।”
रिपोर्ट से मिली जानकारी के अनुसार, म्यूज़ियम में एक ख़ास हिस्सा राजा ख़ुफ़ू की सोलर बोट (सौर नाव) के लिए बनाया गया है। यह 4 हज़ार 600 साल पुरानी बोट है, जो दुनिया की सबसे पुरानी और सबसे सुरक्षित रखी गई बोट में गिनी जाती है।
2002 में इस म्यूज़ियम की घोषणा की गई थी और इसे 2012 में खोलने की योजना थी। इस बीच बढ़ती लागत, राजनीतिक अस्थिरता और कोविड-19 महामारी सहित क्षेत्रीय संघर्षों के कारण इसे स्थगित करना पड़ा।
इस प्रोजेक्ट का अधिकतर भग जापान इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी के कर्ज़ से पूरा हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, इसमें क़रीब 1.2 अरब डॉलर की लागत आई है। मिस्र के प्रधानमंत्री मुस्तफ़ा मैडबौली ने इस म्यूज़ियम को “दुनिया के लिए मिस्र का तोहफ़ा” बताया है। देश की कमज़ोर अर्थव्यवस्था को मज़बूती देने के साथ यह म्यूज़ियम मिस्र की संस्कृति की महानता और उसके असर का भी प्रदर्शन करने के लिए तैयार है।













