इस साल के अंत तक रुपया अमरीकी डॉलर के मुकाबले लगभग 95 रुपये के स्तर पर बना रह सकता है- रिपोर्ट

इस समय भारतीय रुपया 95.20 प्रति डॉलर पर कारोबार कर रहा है। साल 2026 के अंत तक इसके डॉलर के मुकाबले करीब 95 रुपये के स्तर पर रहने का अनुमान है। इसका प्रमुख कारण अमरीका-ईरान संघर्ष और बढ़ती वैश्विक अनिश्चितता बताया गया है। यह विचार बीएमआई की एक रिपोर्ट के ज़रिए सामने आए हैं।

रिपोर्ट से पता चलता है कि बीते बारह महीनों में रुपया करीब दस प्रतिशत कमजोर हुआ है। इससे पहले इतनी बड़ी गिरावट जनवरी 2022 से दिसंबर 2022 के बीच देखी गई थी। उस समय अमरीकी डॉलर के पक्ष में ब्याज दरों का अंतर तेजी से बढ़ा था। तब आरबीआई ने बड़े पैमाने पर हस्तक्षेप किया था जिससे विदेशी मुद्रा भंडार में 13 प्रतिशत की गिरावट आई थी।

इस रिपोर्ट में भारतीय रुपये पर अमरीका-ईरान तनाव और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच दबाव बना रहने की आशंका जताई गई है। बुधवार को फिच समूह की कंपनी बीएमआई द्वारा जारी रिपोर्ट के मुताबिक़, साल 2026 के अंत तक रुपया अमरीकी डॉलर के मुकाबले लगभग 95 रुपये के स्तर पर बना रह सकता है।

चालू वित्त वर्ष 2025-26 के हवाले से रिपोर्ट बताती है कि भारत की जीडीपी वृद्धि दर 7.6 प्रतिशत रह सकती है, जबकि महंगाई दर 3.4 प्रतिशत तक पहुंचने की उम्मीद है। वहीं, भारत का चालू खाता घाटा बढ़कर जीडीपी के 1.3 प्रतिशत तक पहुंच सकता है, जो पहले के अनुमान से 0.4 प्रतिशत ज़्यादा है।

रिपोर्ट से पता चलता है कि अमरीका-ईरान जंग का असर उभरते बाजारों की करेंसी पर साफ नज़र आ रहा है। इसका असर उन देशों पर विशेष रूप से देखा जा सकता है जो ऊर्जा आयात पर अधिक निर्भर हैं। भारत की गिनती भी बड़े तेल आयातकों में होती है और यही कारण है कि मार्च और अप्रैल 2026 के दौरान रुपया करीब चार प्रतिशत तक कमजोर हुआ।

बीएमआई की यह रिपोर्ट बताती है कि रिज़र्व बैंक ऑफ़ इण्डिया, आने वाले महीनों में मुद्रा बाजार में सक्रिय हस्तक्षेप कर रुपये को स्थिर रखने की कोशिश करेगा। इस दौरान रुपये पर दबाव बना रहेगा, हालाँकि मुनाफे की निकासी में कमी और भारतीय रिजर्व बैंक के हस्तक्षेप से इसकी गिरावट की रफ्तार सीमित रह सकती है।

रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में भारत को मिलने वाले कुल रेमिटेंस का लगभग 38 प्रतिशत हिस्सा खाड़ी देशों से आया, जो देश की जीडीपी का करीब 1 प्रतिशत है। यदि ईरान युद्ध के कारण खाड़ी देशों में काम कर रहे भारतीयों की आय प्रभावित होती है, तो इसका असर भारत की अर्थव्यवस्था और रुपये दोनों पर पड़ सकता है।

गौरतलब है कि मार्च 2026 में भारत से 13.4 अरब डॉलर की पूंजी निकासी हुई, जो महामारी के बाद सबसे बड़ा मासिक आउटफ्लो माना गया है। ऐसे में रिपोर्ट के मुताबिक़, रिज़र्व बैंक के पास फिलहाल सात महीने के आयात को कवर करने लायक विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है, जिसका इस्तेमाल वह बाजार में भावनात्मक दबाव और पूंजी निकासी को नियंत्रित करने के लिए कर सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *