जलवायु परिवर्तन से सदी के अंत तक दुनिया की 10 करोड़ से अधिक इमारतें समुद्र में डूब सकती हैं। भारत के मुंबई और चेन्नई शहर भी इस चेतावनी से अछूते नहीं है। यह कहना है मैकगिल विश्वविद्यालय में हुए एक अध्ययन का। इस अध्ययन के अनुसार धरती के शहरों पर बढ़ते समुद्र स्तर का गंभीर असर पड़ सकता है।

नेचर अर्बन सस्टेनेबिलिटी पत्रिका में प्रकाशित मैकगिल विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों का यह अध्ययन बताता है कि अगर जीवाश्म ईंधन के उपयोग पर जल्द रोक नहीं लगी, तो सदी के अंत तक दुनिया की 10 करोड़ से अधिक इमारतें समुद्र में समा सकती हैं। यह न सिर्फ आवासीय ढांचों बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था, बंदरगाहों, रिफाइनरियों और सांस्कृतिक धरोहरों के लिए भी भारी खतरा साबित हो सकता है।
इस चेतावनी के हवाले से अध्ययन से जुड़ी वैज्ञानिक प्रोफेसर नताल्या गोमेज का कहना है कि समुद्र के बढ़ते स्तर का असर पहले से ही तटीय आबादी को प्रभावित कर रहा है। आगे वह कहती हैं कि जलवायु परिवर्तन की वर्तमान गति को देखते हुए समुद्र कई मीटर तक बढ़ सकता है। समुद्र में आधा मीटर बढ़ोतरी से लाखों ढांचे डूब सकते हैं।
जलवायु विशेषज्ञ बार-बार अपनी इस चेतावनी को दोहरा रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन की वजह से समुद्र का बढ़ता जलस्तर दुनिया के तटीय शहरों के लिए अस्तित्व का संकट बनता जा रहा है।
अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों ने 0.5 मीटर से लेकर 20 मीटर तक समुद्र-स्तर वृद्धि के विभिन्न परिदृश्यों की पड़ताल की। ये जानकारी बताती है कि यदि समुद्र का स्तर सिर्फ 0.5 मीटर बढ़ता है, जैसा कि उत्सर्जन में कटौती के बावजूद मुमकिन है, तो करीब 30 लाख इमारतें डूब जाएंगी। उत्सर्जन बढ़ने की दशा में समुद्र का स्तर 5 मीटर या उससे अधिक पहुंच गया तो यह संख्या 10 करोड़ से ऊपर जा सकती है।
वैश्विक संकट से जुड़ा यह बताता है कि मुंबई-चेन्नई सहित कई प्रमुख शहर इस खतरे की चपेट में हैं। मुंबई में समुद्र के बढ़ते जलस्तर से 830 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र डूबने के खतरे की बात इस अध्ययन से सामने आई है। सदी के अंत तक यह बढ़कर 1,377 वर्ग किमी यानी 21.8% तक पहुंच सकता है।
चेन्नई की बात करें तो इस तटीय शहर का लगभग 7.3% हिस्सा 86.8 वर्ग किमी अगले 16 वर्षों में जलमग्न होने का खतरा बना हुआ है। साल 2100 तक इसके 18% यानी 215.77 वर्ग किमी तक बढ़ जाने का अंदेशा है। इनमे यनम और थूथुकुड़ी के करीब 10% इलाके व पणजी, कोच्चि, मंगलूरू, विशाखापत्तनम, हल्दिया, उडुपी, पारादीप और पुरी में 1 से 5% तक की जमीन डूबने की चेतावनी दी गई है।
देश के अन्य खतरे वाले इलाक़ों में लक्षद्वीप भी है। इन द्वीपों में समुद्र का जलस्तर 0.4 से 0.9 मिलीमीटर प्रतिवर्ष की दर से बढ़ने का अनुमान है। ऐसे में चेतलाट और अमिनी जैसे छोटे द्वीपों की 70 से 80% तटरेखा को खतरा है।
जलवायु परिवर्तन और समुद्र के बढ़ते स्तर पर प्रोफेसर जेफ कार्डिले कहते हैं कि समुद्र स्तर में मामूली वृद्धि भी कई देशों में लाखों ढांचों को खतरे में डाल सकती है। प्रभाव हर देश में अलग होगा, जो उसकी भौगोलिक संरचना और निर्माण के तरीकों पर निर्भर करेगा।















