‘परमाणु हथियारों से कोई सुरक्षा हासिल नहीं होती है, केवल सर्वनाश का वादा मिलता है। यह कहना है यूएन महासचिव एंतोनियो गुटेरेश का। उन्होंने यह सदेश इस वर्ष 26 सितम्बर को ‘परमाणु हथियारों के पूर्ण उन्मूलन के अन्तरराष्ट्रीय दिवस’ पर दिया।

26 सितम्बर को यूएन महासभा में परमाणु हथियारों के पूर्ण उन्मूलन के अन्तरराष्ट्रीय दिवस की याद और उसे बढ़ावा देने के इरादे से एक उच्चस्तरीय बैठक बुलाई गई है। बताते चलें कि संयुक्त राष्ट्र महासभा ने दिसम्बर 2013 में एक प्रस्ताव पारित करके हर वर्ष 26 सितम्बर को परमाणु हथियारों के पूर्ण उन्मूलन के अन्तरराष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाए जाने की घोषणा की थी।
इसी सिलसिले में इस वर्ष आयोजित होने वाली उच्चस्तरीय बैठक का उद्देश्य है- ‘सार्वजनिक जागरुकता का प्रसार, वैश्विक निरस्त्रीकरण विषय में गहरा सम्पर्क व बातचीत।’ संयुक्त राष्ट्र की शीर्ष निरस्त्रीकरण प्राथमिकताओं में, परमाणु निरस्त्रीकरण है। इसकी अहमियत का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि 1946 में यूएन महासभा का पहला प्रस्ताव भी इसी विषय पर लाया गया था। इसके बाद के वर्षों व दशकों में भी संयुक्त राष्ट्र ने इस दिशा में कूटनैतिक प्रयासों की अगुवाई की है।
दूसरे विश्व युद्ध के आखिरी समय में जब यूनाइटेड नेशन की परिकल्पना को आकार दिया जा रहा था, तभी जापान के दो शहरों पर गिराए गए परमाणु बमों ने दुनिया को विध्वंस के प्रति आगाह भी किया। आज आठ दशक बाद यूएन की 80वीं वर्षगाँठ के ऐतिहासिक अवसर पर एक उच्चस्तरीय बैठक में इन हथियारों में निहित ख़तरों और उनके उन्मूलन प्रयासों पर फिर चर्चा होगी। आज भी दुनिया उन्हीं खतरों से दो-चार है जब विश्व में भूराजनैतिक तनावों के बीच मानवता पर इन हथियारों का जोखिम मंडरा रहा है।
महासभा ने 1959 में पूर्ण निरस्त्रीकरण के लक्ष्य को अपना समर्थन दिया। इसके बाद 1978 में निरस्त्रीकरण के लिए समर्पित जनरल असेम्बली का पहला विशेष सत्र बुलाया गया, जिसमें माना गया कि निरस्त्रीकरण के क्षेत्र में परमाणु निरस्त्रीकरण शीर्ष प्राथमिकता होगा।
वर्तमान में भूराजनैतिक तनाव और भरोसे की कमी के कारण परमाणु युद्ध का ख़तरा पिछले कुछ दशकों में अपने उच्चतम स्तर पर है। भले ही ये हथियार अब तक केवल दो बार ही इस्तेमाल में लाए गए हों, मगर दुनिया भर में फ़िलहाल 12 हज़ार से अधिक परमाणु हथियार मौजूद हैं, जोकि पूरे शहर, लाखों लोगों, पर्यावरण व भावी पीढ़ियों को तबाह कर सकते हैं।
विश्व आबादी का 50 फ़ीसदी से अधिक अब भी उन देशों में है, जिनके पास या तो ऐसे हथियार हैं या फिर वे परमाणु गठबंधनों का हिस्सा हैं। यूक्रेन युद्ध समेत अन्य हिंसक टकरावों के दौरान भी इन हथियारों के प्रति आशंकाएँ गहरी हुई हैं।
परमाणु शक्ति सम्पन्न देशों के पास परमाणु हथियारों के अपने जखीरे को आधुनिक बनाने के लिए योजनाएँ हैं, इसके अलावा एआई जैसी टैक्नॉलॉजी के इस्तेमाल से ये ख़तरा और जटिल हुआ है।
शीत युद्ध की समाप्ति के बाद से तैनात किए गए परमाणु हथियारों की संख्या में भले ही कमी आई हो, लेकिन किसी सन्धि की वजह से एक भी परमाणु हथियार को ख़त्म नहीं किया गया है और न ही परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए फ़िलहाल कोई वार्ता हो रही है.
मौजूदा व्यवस्थाओं पर दबाव बनाने और परमाणु हथियारों पर विराम लगाने के इरादे से अनेक बहुपक्षीय सन्धियों व उपायों को स्थापित किया गया है, ताकि उन पर पाबन्दी, नियामन या फिर उन्मूलन सुनिश्चित किया जा सके। अन्तरराष्ट्रीय शस्त्र-नियंत्रण फ़्रेमवर्क से परमाणु हथियारों के इस्तेमाल पर ब्रेक लगाए गए हैं और निस्त्रीकरण को भी बढ़ावा मिला, लेकिन अब इस व्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है। इनमें परमाणु हथियार अप्रसार सन्धि, व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबन्ध सन्धि, परमाणु हथियार निषिद्ध सन्धि समेत अन्य पहल हैं।
मगर इस दौरान हिंसक टकरावों, वैश्विक अस्थिरता से शस्त्र नियंत्रण व्यवस्थाओं व निरस्त्रीकरण सन्धियों पर दबाव बढ़ने से परमाणु हथियारों के लिए नए सिरे से होड़ मच सकती है। संयुक्त राज्य अमरीका ने 2019 में माध्यमिक दूरी के लिए परमाणु बल सन्धि से अपने हाथ खींचने की घोणा की थी, जोकि परमाणु मिसाइलों के एक प्रकार के उन्मूलन पर लक्षित थी।
2022 में आयोजित एक सम्मेलन में परमाणु अप्रसार सन्धि की समीक्षा पर कोई आम सहमति नहीं बन पाई थी। उसके अगले वर्ष रूस ने व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबन्ध सन्धि से अपना अनुमोदन वापिस ले लिया। साथ ही रणनैतिक हथियारों में कमी लाने वाली सन्धि को भी स्थगित करने का निर्णय लिया। सदस्य देशों में परमाणु निरस्त्रीकरण की सुस्त रफ़्तार पर निराशा के साथ यह चिन्ता भी है कि इक़लौते परमाणु हथियार के इस्तेमाल से कितने बड़े पैमाने पर विनाश हो सकता है।
संयुक्त राष्ट्र की 80वीं वर्षगाँठ पर यह बैठक परमाणु निरस्त्रीकरण, अप्रसार के प्रति नए सिरे से संकल्प व्यक्त करने और परमाणु हथियारों में निहित ख़तरों के प्रति जागरुकता फैलाने का अवसर होगी। उच्चस्तरीय बैठक के मुख्य उद्देश्य में परमाणु हथियार सम्पन्न देशों से फिर से सम्वाद में शामिल होने का आग्रह की बात की गई है, ताकि एकजुट प्रयासों के ज़रिए पादर्शिता व भरोसा बढ़ाने वाले क़दमों को प्रोत्साहन मिले।
इसके अलावा क़ानूनी रूप से बाध्यकारी निरस्त्रीकरण संकल्पों का आहवान और जवाबदेही तंत्र पर बल देने के साथ किसी भी परमाणु शक्ति सम्पन्न देश द्वारा इन हथियारों का पहले इस्तेमाल नहीं करने पर सहमति की भी बात रखी जाएगी। साथ ही परमाणु हथियारों के सबसे बड़े जखीरे वाले देशों- संयुक्त राज्य अमरीका और रूसी महासंघ से उदाहरण पेश करने और निरस्त्रीकरण सन्धि का अनुपालन करने की अपील भी समे शामिल है।









