नाम बदलने की परंपरा नै नहीं है। इससे पहले तुर्की ने 2022 में संयुक्त राष्ट्र से देश को ‘तुर्किये’ (Türkiye) कहने को कहा था। साल 2018 में अफ़्रीका के छोटे से देश स्वाज़ीलैंड ने अपना पुराना नाम ‘एस्वातिनी’ (Eswatini) कर लिया था।
प्रशांत महासागर में स्थित द्वीप देश नाउरू ने अपना नाम बदलकर ‘रिपब्लिक ऑफ़ नाओएरो’ कर लिया है। सरकार के सोशल मीडिया अकाउंट पर जारी अपने बयान में कहा कि इस कदम से दक्षिण प्रशांत महासागर में स्थित यह दूर-दराज़ का द्वीप देश अपने पारंपरिक नाम पर वापस लौट आएगा।
राष्ट्रपति ने कारण बताते हुए कहा कि यह बदलाव देश की अपनी भाषा में नाम की स्पेलिंग और उच्चारण के हिसाब से किया गया है। सरकार के एक पुराने बयान के अनुसार, देश को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘नाउरू’ के नाम से इसलिए जाना जाने लगा क्योंकि विदेशियों के लिए इसका स्थानीय नाम बोलना मुश्किल था; यह नाम पसंद के बजाय सुविधा के कारण चुना गया था।
अंतर्राष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, देश का इंटरनेशनल कोड NRU से बदलकर NRO हो जाएगा और यहाँ के लोगों को ‘नाउरुआन’ (Nauruan) के बजाय ‘देई-नाओएरो’ (dei-Naoero) कहा जाएगा। विदेश में इसे आम तौर पर ‘नाउ-रू’ (Now-roo) कहा जाता है, लेकिन नए नाम का उच्चारण ‘नाउ-एरो’ (Now-ero) होगा।
राष्ट्रपति डेविड एडांग ने जनवरी में संसद में यह प्रस्ताव रखते हुए कहा था, “इस प्रस्तावित बदलाव का मकसद हमारे देश की विरासत, हमारी भाषा और हमारी पहचान का बेहतर ढंग से सम्मान करना है।” प्रस्तावित संवैधानिक संशोधन को सांसदों ने वोटिंग के ज़रूरी दो राउंड में मंज़ूरी दे दी है, हालाँकि यह तुरंत साफ़ नहीं हो पाया कि दस्तावेज़ में औपचारिक रूप से संशोधन किया गया है या नहीं।
12,000 निवासियों वाला नाउरू, आबादी के लिहाज़ से तुवालु और वेटिकन सिटी के बाद दुनिया का तीसरा सबसे छोटा देश है। कोरल लाइमस्टोन से बना यह छोटा सा द्वीप पहले जर्मनी का उपनिवेश था और बाद में ऑस्ट्रेलिया के प्रशासन में रहा, जिसके बाद 1968 में यह एक स्वतंत्र गणराज्य बना।
इस देश ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। 1970 के दशक में फ़ॉस्फेट माइनिंग से द्वीप पर बहुत दौलत आई, लेकिन बाद में यह इंडस्ट्री ठप हो गई, जिससे 1990 के दशक में नाउरू आर्थिक बर्बादी की कगार पर पहुँच गया।
वर्तमान में जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र का जलस्तर बढ़ने से यह देश दुनिया के सबसे ज़्यादा ख़तरे वाले देशों में से एक बन गया है। इसी वजह से सरकार ने ‘पेड सिटिज़नशिप प्रोग्राम’ (पैसे देकर नागरिकता पाने का कार्यक्रम) के ज़रिए विदेशी निवेश जुटाने का फ़ैसला किया है, ताकि लोगों और बुनियादी ढाँचे को समुद्र के बढ़ते दायरे से दूर ले जाने के लिए फ़ंड मिल सके।
एडांग ने अपनी हालिया घोषणा में कहा कि नाम बदलने का यह फ़ैसला “नए सिरे से राष्ट्रीय गौरव की शुरुआत” का संकेत है। जब उनकी सरकार ने पिछली बार मई में इस कदम के लिए वोट किया था, तो राष्ट्रपति ने इसकी पुष्टि के लिए एक जनमत संग्रह (रेफरेंडम) कराने की घोषणा की थी।
सरकार ने पिछले हफ़्ते एक बयान में कहा कि बातचीत” के बाद, सांसदों ने तय किया कि जनता से वोट कराने की ज़रूरत नहीं है। बयान में कहा गया, “हालांकि जनमत संग्रह का मकसद लोगों की राय जानना होता है, लेकिन ‘नाओएरो’ (Naoero) नाम कभी खोया नहीं था, बल्कि इसे पूरी तरह अपनाए जाने का इंतज़ार था।”
इसमें आगे कहा गया कि यह नाम “पहले से ही लोगों की पहचान है, राष्ट्रीय प्रतीक पर मौजूद है और समुदाय में बोला जाता है; और सबसे ज़रूरी बात यह है कि संविधान में इसकी इजाज़त है।”
नाउरू के इस फ़ैसले के बाद उसके राष्ट्रीय विमानों और जहाज़ों का नाम भी बदला जाएगा। सरकार के बयान के मुताबिक, वह पहले से ही दूसरे देशों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से इस बदलाव को मान्यता दिलाने की कोशिश कर रही थी।
संयुक्त राष्ट्र की वेबसाइट पर देश का नया नाम दर्ज है और बताया गया है कि सरकार ने जून में नाम बदलने का अनुरोध किया था। ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड के विदेश मंत्रालयों के साथ-साथ इस क्षेत्र में मौजूद अमेरिका और चीन के दूतावास भी अपनी वेबसाइटों पर देश का नाम ‘नाओएरो’ (Naoero) ही बताते हैं।
इस बदलाव के साथ ही यह देश अपना नाम बदलकर औपनिवेशिक अतीत से अलग होने का संकेत देने वाला सबसे नया देश बन गया है। याद दिला दें कि अफ़्रीका के छोटे से देश स्वाज़ीलैंड ने 2018 में अपना पुराना नाम ‘एस्वातिनी’ (Eswatini) फिर से अपना लिया था। दूसरे देशों ने भी एक तरह की रीब्रांडिंग के तौर पर ऐसा बदलाव किया है, जैसे तुर्की ने 2022 में संयुक्त राष्ट्र से देश को ‘तुर्किये’ (Türkiye) कहने को कहा था, एक ऐसा नाम जिससे देश को अपने यहाँ पहले से ही जाना जाता था।