एक नई रिसर्च से पता चला है कि प्लास्टिक प्रदूषण दुनिया के सबसे दूरदराज और मुश्किल हालात वाले इकोसिस्टम में भी तेज़ी से जमा हो रहा है। इस बार यह माइक्रोप्लास्टिक गहरे समुद्र में मौजूद हाइड्रोथर्मल वेंट्स यानी समुद्र तल पर गर्म पानी के स्रोत से प्राप्त हुआ है।
ओशनोग्राफिक मैगज़ीन डॉट कॉम की एक खबर बताती है कि गहरे समुद्र में रहने वाले 90% से ज़्यादा मोलस्क (घोंघे और सीप जैसे जीव) माइक्रोप्लास्टिक से दूषित थे, और हिंद महासागर में इनका स्तर लगभग 15 गुना ज़्यादा था।
तटीय इलाकों के हमारे सबसे पसंदीदा जीवों को प्लास्टिक प्रदूषण में फँसते और घायल होते हुए दिखाने वाली तस्वीरें तो खूब चर्चा में रही हैं। लेकिन समुद्र की गहराई में जमा हो रहे इस कचरे के छिपे हुए, और दूरगामी असर के बारे में कम ही लोग जानते हैं।
रिसर्चर्स ने पाया कि समुद्र तल से 2,000 मीटर (6,600 फीट) से ज़्यादा गहराई में मौजूद वेंट्स पर रहने वाले 90% से ज़्यादा घोंघे और सीप (mussels) माइक्रोप्लास्टिक से दूषित थे। इस प्रदूषण का ज़्यादातर हिस्सा पॉलीस्टाइनिन जैसे पॉलिमर से आया था, जिनका इस्तेमाल दुनिया भर में कंज्यूमर पैकेजिंग और सिंगल-यूज़ कंटेनर बनाने में बड़े पैमाने पर किया जाता है।
दिलचस्प बात यह है कि भौगोलिक स्थिति ने इसमें बहुत बड़ी भूमिका निभाई। दक्षिण-पश्चिमी प्रशांत महासागर के जीवों की तुलना में हिंद महासागर के जीवों में माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा काफ़ी ज़्यादा लगभग 15 गुना ज़्यादा पाई गई। रिसर्चर्स का मानना है कि इस अंतर की वजह तटीय इलाकों में इंसानी गतिविधियाँ और बड़ी नदियों के ज़रिए हिंद महासागर में बहकर आने वाला भारी मात्रा में प्लास्टिक है।
ये नतीजे कोरिया रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ़ बायोसाइंस एंड बायोटेक्नोलॉजी (KRIBB) के डॉ से-जू किम और डॉ जिनयंग जियोंग की एक संयुक्त स्टडी से सामने आए हैं, जिसे कोरिया इंस्टीट्यूट ऑफ़ ओशन साइंस एंड टेक्नोलॉजी (KIOST) के सहयोग से किया गया था।
टीम ने KIOST द्वारा दक्षिण-पश्चिमी प्रशांत महासागर के नॉर्थ फिजी बेसिन और हिंद महासागर की सेंट्रल इंडियन रिज में मौजूद हाइड्रोथर्मल वेंट्स से इकट्ठा किए गए गहरे समुद्र के नमूनों का विश्लेषण किया। नतीजे इंसानों द्वारा बनाए गए कचरे की भारी मात्रा और उन रास्तों को उजागर करते हैं, जिनसे ये सूक्ष्म कण समुद्री जीवों के शरीर में पहुँचते हैं।
अध्ययन में पाया गया कि किसी जीव की बायोलॉजी ही यह तय करती है कि प्लास्टिक उसके शरीर के अंदर कैसा व्यवहार करेगा। समुद्र की तलहटी पर मौजूद माइक्रोबियल मैट (सूक्ष्मजीवों की परत) को खाने वाले घोंघों में, माइक्रोप्लास्टिक मुख्य रूप से पाचन अंगों में जमा पाए गए। इसके विपरीत, फिल्टर-फीडिंग मसल्स (एक प्रकार की सीप) में माइक्रोप्लास्टिक उनके विभिन्न ऊतकों में अपेक्षाकृत समान रूप से फैले हुए पाए गए।
अध्ययन के संबंधित लेखकों में से एक, डॉ किम ने कहा, “प्लास्टिक प्रदूषण अब गहरे समुद्र के हाइड्रोथर्मल वेंट इकोसिस्टम तक भी फैल गया है, जिन्हें कभी पृथ्वी पर सबसे अलग-थलग वातावरणों में से एक माना जाता था।” आगे उन्होंने कहा कि यह निष्कर्ष भविष्य में गहरे समुद्र की पर्यावरण निगरानी प्रणालियों और संरक्षण नीतियों को स्थापित करने के लिए महत्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रमाण प्रदान करते हैं।