एक नई रिपोर्ट से पता चलता है कि मेटा ने राशि लेकर सैकड़ों ऐसे विज्ञापन चलाए हैं जिनमें आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस से बनाई गई बच्चों के यौन शोषण की तस्वीरें और वीडियो हैं।
बाल यौन शोषण और हिंसक सामग्री का प्रचार भारत में आपराधिक जुर्म है। मेटा की पॉलिसी के अनुसार, विज्ञापन में ऐसा कोई कंटेंट नहीं दिखाया जा सकता जो बच्चे-बच्चियों का यौन शोषण करे या उन्हें इसके ख़तरे में डाले।
अंतर्राष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, टेक कंपनियों की जवाबदेही और पारदर्शिता के मुद्दे पर काम करनेवाले अमरीकी कार्यकर्ताओं की यह रिपोर्ट बताती है कि पिछले दस महीनों में दिखाए गए इन विज्ञापनों में दर्जनों भारत में चलाए गए हैं।
रिपोर्ट के मिताबिक़, बच्चों के यौन शोषण की सामग्री को बाल अधिकार सुरक्षा क़ानूनों के तहत भारतीय जांच एजेंसियों को रिपोर्ट करना ज़रूरी है लेकिन ऐसा न कर सोशल मीडिया कंपनियां साफ़ तौर पर भारत के क़ानूनों का उल्लंघन कर रही हैं।
सरकार के इस आदेश के दो महीने बाद आने वाली ये रिपोर्ट बताती है कि भारत में मेटा को इंस्टाग्राम से बच्चों के यौन शोषण की सामग्री वाले कंटेंट (सीसैम-CSAM) और विज्ञापन हटाने के आदेश दिए गए थे। इस बीच बीबीसी-आई की पड़ताल के बाद पता चला कि इंस्टाग्राम रक़म लेकर ऐसी सामग्री के प्रचार वाले विज्ञापन भारत में चला रहा है।
ख़बरों के मुताबिक़, यह मामला बच्चों के यौन शोषण और दुर्व्यवहार से जुड़े मटीरियल (सीएसईएएम) से कथित तौर पर जुड़े विज्ञापनों की जांच से संबंधित है। एनसीपीसीआर यानी नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स ने मेटा इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर और हेड को नौ सितंबर को अपने सामने पेश होने के लिए बुलाया है।
गौरतलब है कि कमीशन ने बीबीसी आई की एक मीडिया रिपोर्ट का स्वतः संज्ञान लिया और 3 जुलाई, 2026 को मेटा प्लेटफॉर्म्स, इंक. को नोटिस जारी करके आरोपों पर स्पष्टीकरण मांगा।
मीडिया रिपोर्ट्स से यह भी पता चला है कि वॉशिंगटन स्थित टेक ट्रांसपेरेंसी प्रोजेक्ट (टीटीपी) ने बताया कि उन्हें फ़ेसबुक और इंस्टाग्राम पर सीसैम (CSAM) वाले 332 विज्ञापन मिले। इनमें से ज़्यादातर (274) इसी साल अगस्त महीने में चलाए गए थे।
बीबीसी की ओर से इन परिणामों के बारे में मेटा को लिखे जाने पर एक बयान में उन्होंने कहा, “हम न्यूडिफ़ाई ऐप या बच्चों का किसी तरह का शोषण बर्दाशत नहीं करते। चाहे वो असल ज़िंदगी में हो या आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (एआई) की मदद से बनाया गया हो। आपराधिक तत्व पकड़ने से बचने के लिए हर वक़्त तरीके बदलते रहते हैं। इस वजह से हम इन्हें खोजने की कोशिशों को मज़बूती से लागू करते हैं।”
मंगलवार को प्रकाशित हुई टीटीपी की रिपोर्ट में कहा गया है कि उन्होंने यूरोप के राजपरिवार के बच्चे समेत कई असल बच्चों की पहचान की है। इनकी तस्वीरें विज्ञापनों में इस्तेमाल की गईं हैं और एआई के इस्तेमाल से बदली गई हैं। टीटीपी के मुताबिक मेटा को अपने शोध के नतीजों से अवगत करवाने के बाद भी कंपनी के प्लेटफ़ॉर्म पर ऐसे विज्ञापन चलाए जाते रहे।
वहीँ रिपोर्ट बताती है कि करीब एक-चौथाई (84) विज्ञापन भारत में चलाए गए। इनमें से 78 भारत सरकार के इंस्टाग्राम को सीसैम (CSAM) हटाने और मेटा के अधिकारियों से मुलाक़ात के बाद प्रकाशित हुए।
बीबीसी की पड़ताल के बाद राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग सहित कई भारतीय एजेंसियों ने कहा है कि वे इस मामले की जाँच कर रही हैं। इस पड़ताल का हवाला देते हुए ‘जस्ट राइट्स फ़ॉर चिल्ड्रन’ ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स के लिए दिशा-निर्देश की माँग की है। इसके तहत उनके लिए सीसैम का प्रसार करनेवालों की पहचान करने और एजेंसियों को उसकी रिपोर्टिंग करना अनिवार्य बनाने की माँग की गई है।