नस्लवाद और नस्लीय भेदभाव से निपटने के लिए अभी भी एक लंबा सफ़र बाक़ी है

आईआईटी मुंबई में पढ़ने वाले साहिल वाकोडे की मौत और छात्रों का आंदोलन कई गंभीर सवाल उठाता है। आईआईटी मुंबई में बीटेक सेकंड ईयर के छात्र साहिल वाकोडे ने इस महीने की 18 को आत्महत्या की थी। यह घटना दुनिया ने नस्लवाद और नस्लीय भेदभाव से निपटने की दिशा में अभी तक की प्रगति को कटघरे में लाती है।

नस्लवाद और नस्लीय भेदभाव से निपटने के लिए अभी भी एक लंबा सफ़र बाक़ी है। वर्ष 2001 में दक्षिण अफ़्रीका के डरबन शहर में नस्लवाद के विरोध में एक घोषणापत्र पारित किया गया था, जिसकी 25वीं वर्षगाँठ के सिलसिले में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में सोमवार को हुई एक उच्चस्तरीय बैठक के दौरान इन चुनौतियों पर पार पाने के लिए नए सिरे से प्रतिबद्धता व्यक्त की गई।

‘डरबन घोषणापत्र और कार्रवाई कार्यक्रम’ को नस्लवाद से मुक़ाबले में, अब तक का सबसे व्यापक फ़्रेमवर्क माना गया है, जोकि ऐतिहासिक अन्यायों को स्वीकारने, असमानताओं को दूर करने, और नस्लीय भेदभाव से रक्षा करने पर केन्द्रित है।

यूएन महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने डरबन घोषणापत्र की 25वीं वर्षगाँठ के सिलसिले में न्यूयॉर्क में आयोजित कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए कहा कि नस्लवाद के विरुद्ध लड़ाई में मज़बूत क़ानूनों, समावेशी संस्थाओं और क्षतिपूर्ति के लिए न्यायिक उपायों की आवश्यकता है। उन्होंने नस्लवाद को एक ऐसा विष क़रार दिया, जिसकी बुनियाद दासता और औपनिवेशवाद में है और जिसके असर अब भी महसूस किए जाते हैं।

महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने नस्लवाद को समाजों में विष घोलने वाला बताया और कहा कि यह असमानताओं को गहरा करने के साथ लोगों के लिए उनके बुनियादी अधिकारों व स्वतंत्रताओं को नकार रहा है।

उनके अनुसार, नस्लवाद के अनेक रूप हो सकते हैं: आर्थिक, सामाजिक व राजनैतिक असमानताओं से लेकर, भेदभावपूर्ण क़ानूनों, नीतियों व संस्थाओं तक। महासचिव गुटेरेश ने आगाह किया कि नई टैक्नॉलॉजी और डिजिटल माध्यमों की वजह से नफ़रत भरे भाषण व सन्देश, भ्रामक जानकारी तेज़ी से फैल रही हैं, झूठ व हानिकारक रूढ़िवादी धारणाओं को बल मिल रहा है और हिंसा व दुर्व्यवहार को ईंधन।

यूएन प्रमुख ने कहा कि इस विष का मुक़ाबला, पारस्परिक एकता और ठोस कार्रवाई के ज़रिए किया जाना होगा। उन्होंने देशों की सरकारों से भेदभाव के विरोध व समानता के समर्थन में क़ानूनों को मज़बूती देने का आग्रह किया। इसकी अगुवाई सरकारों को करनी होगी, लेकिन उनके अनुसार, इस प्रक्रिया में हर किसी की एक भूमिका है।

व्यवसायों को प्रत्यक्ष व परोक्ष भेदभाव की रोकथाम करनी होगी और कार्यस्थलों में ऐसा माहौल तैयार करना होगा, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति अपना योगदान दे सके। उन्होंने बताया कि युवा पीढ़ियाँ, गरिमा, न्याय व समानता की भावना को कक्षाओं, समुदायों, कार्यस्थलों, टैक्नॉलॉजी प्रयोगशालाओं और डिजिटल प्लैटफ़ॉर्म तक पहुँचाने में जुटी हैं, जहाँ भविष्य को आकार दिया जाता है।

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