एक्सपर्ट्स ने ब्लड टेस्ट और ब्रेन स्कैन के दो नए तरीकों को अल्ज़ाइमर के शुरुआती डायग्नोसिस के लिए ज़रूरी माइलस्टोन बताया है। विदेशी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन तरीकों से बीमारी के लक्षण दिखने से कई साल पहले ही पता चल सकते हैं।
अल्जाइमर एक दिमागी बीमारी है जिसमें याददाश्त कमजोर होती है। इसके ज्यादातर मामलों में परिवार ही देखभाल का मुख्य सहारा होते हैं। भारत में अल्जाइमर और डिमेंशिया से पीड़ित लोगों की संख्या 50 लाख से अधिक है। यह समस्या बढ़ती उम्र के साथ तेजी से बढ़ रही एक प्रमुख स्वास्थ्य चुनौती है।
वहीँ यूके में 520,000 से ज़्यादा लोग अल्ज़ाइमर से परेशान हैं, जो डिमेंशिया का सबसे आम टाइप है और देश में मौत का सबसे बड़ा कारण है। हालांकि इसका कोई इलाज नहीं है, लेकिन शुरुआती डायग्नोसिस से बीमारी के बढ़ने की रफ़्तार धीमी हो सकती है और लक्षणों को कंट्रोल किया जा सकता है।
साइंटिफिक रिसर्च के मुताबिक, अल्ज़ाइमर के 90% से ज़्यादा मामले एक ही जीन से जुड़े होते हैं। ब्लड टेस्ट से ऐसे प्रोटीन (एमाइलॉयड बीटा और टाऊ) की पहचान हुई है जो दिमाग की कमज़ोरी और याददाश्त की कमी से जुड़े हैं।
अमरीकन स्टडी में 61 साल की एवरेज उम्र के 1,350 लोगों का टेस्ट किया गया, जिसमें ज़्यादा बायोमार्कर वाले लोगों की याददाश्त और मेंटल परफॉर्मेंस खराब पाई गई। इस टेस्ट को US में FDA से मंज़ूरी मिल गई है, लेकिन यह अभी यूके में अवेलेबल नहीं है।
ब्रेन स्कैन की दूसरी स्टडी में एक नए रेडिएशन ट्रेसर (MK6240) का इस्तेमाल किया गया, जो मौजूदा तरीके से दोगुना असरदार था और शुरुआती मरीज़ों में टाउ प्रोटीन की मौजूदगी को बेहतर ढंग से दिखाता था।
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, ये नतीजे न सिर्फ़ रिसर्च और क्लिनिकल ट्रायल्स के लिए ज़रूरी हैं, बल्कि इससे NHS भविष्य में अल्ज़ाइमर के इलाज के लिए दो नई दवाओं (डोनानिमैब और लेकेनिमैब) को भी मंज़ूरी दे सकता है, जिन्हें पहले कीमत की वजह से रिजेक्ट कर दिया गया था।
अल्ज़ाइमर सोसाइटी और दूसरे एक्सपर्ट्स ने नतीजों को “हौसला बढ़ाने वाला” बताया है, लेकिन इस बात पर ज़ोर दिया है कि यह साबित करने के लिए और रिसर्च की ज़रूरत है कि ये टेस्ट आम क्लिनिकल इस्तेमाल के लिए सुरक्षित और असरदार हैं।