फिल्म रिव्यू- इरफान की ‘मदारी’

बाज ने चूजे को पकड़ा और मार डाला। कहानी सच्ची लगती है, लेकिन अच्छी नहीं लगती। चूजे ने बाज को पकड़ा और मार डाला। कहानी सच्ची नहीं लगती, लेकिन अच्छी लगती है…

ये फिल्म एक ऐसे ही संवाद से शुरू होती है। तो क्या ये कहानी बाज और चूजे की है? इस फिल्म का ट्रेलर इतना तो बयां कर ही देता है कि ये कहानी सिस्टम से हारे हुए एक आम इंसान की कहानी है, जो अपने साथ घटी त्रासदी का सच जानने के लिए देश के एक बड़े मंत्री के बेटे का अपहरण कर लेता है। लेकिन क्या ये अपहरण किसी फिरौती के लिए है या फिर बदला लेने के लिए? बेटे के बदले बेटा या कुछ और?

madari

फिल्म की शुरूआत तेज अंदाज के साथ शुरू होती है। देश के गृहमंत्री प्रशांत गोस्वामी (तुषार दल्वी) के आठ साल के बेटे रोहन (विशेष बंसल) का किसी ने अपहरण कर लिया है। अपहरणकर्ता के बारे में पुलिस के पास कोई सुराग नहीं है। फिरौती की कोई मांग भी नहीं आई है। रोहन कहां है और किस हाल में, इस बारे में भी कुछ पता नहीं है। मामले की जांच एक वरिष्ठ जांच अधिकारी नचिकेत वर्मा (जिमी शेरगिल) को सौंपी जाती है, जिसकी टीम शुरआती जांच में कम से कम ये तो पता कर ही लेती है कि ये अपहरण पैसों के लिए नहीं किया गया है। और न ही इसमें किसी आतंकी संगठन वगैराह का हाथ है।

तो फिर अपहरणकर्ता है कौन? अपहरण के पीछे उसका क्या मकसद है? इस गुत्थी को सुलझाने के लिए नचिकेत प्रसाय कर ही रहा होता है कि अचानक उसके पास अपहरणकर्ता का एक फोन आता है। ये बताने के लिए कि रोहन सुरक्षित है। लगातार ठिकाने बदल रहा ये अपहरणकर्ता फिर से गायब हो जाता है। भेष बदल-बदल कर बार-बार वो पुलिस को चकमा दे देता है। काफी मशक्कत के बाद इस मामले में नचिकेत को बड़ी मुश्किल से एक सुराग मिलता है कि ये कोई चोट खाया इंसान है, जिसे सिस्टम की मार ने बदहाल कर दिया है। काफी गहरी जांच से पता चलता है कि निर्मल कुमार (इरफान खान) नामक मुंबई में रहने वाले एक शख्स के सात साल के बेटे की एक हादसे में मौत हो गई थी। निर्मल उस हादसे के जिम्मेदार लोगों से कुछ सवाल करना चाहता है, जिसमें सबसे प्रमुख है प्रशांत गोस्वामी। लेकिन इस बातचीत के लिए निर्मल ने कुछ और बड़ी तैयारियां भी कर रखी है, जिसके बारे में पुलिस और जांच एजेंसी को जरा भी अंदाजा नहीं है।

निर्देशक निशिकांत कामत की ये थ्रिलर फिल्म दो बेहद अच्छे अभिनेताओं के कंधों पर मजबूती से खड़ी दिखती है, जिसमें कहानी से ज्यादा अच्छी लगती है इसकी पटकथा और संवाद। इरफान और जिमी शेरगिल के संवाद बोलने का अंदाज ही फिल्म में बांधे रखने के लिए काफी है। बावजूद इसके सवा दो घंटे की ये फिल्म काफी लंबी लगती है और कई जगहों से उलझी हुई भी। हालांकि फिल्म का क्लाईमैक्स एक रोचक बातचीत और खुलासे पर आधारित है, जो काफी हद तक फिल्म की जान भी है। लेकिन ऐसा लगता है कि इस दमदार सीन के लिए फिल्म को बेवजह काफी लंबा भी कर दिया है।

यह एक भावनात्मक कहानी है, जो अपने संवादों से कई जगह सोचने पर भी मजबूर करती है। फिल्म में गृहमंत्री के मुख से एक संवाद है। वह कहता है, ‘सरकार भ्रष्ट नहीं है। भ्रष्टाचार है तो सरकार है…’ एक अन्य संवाद में निर्मल, गृहमंत्री से पूछता है… क्या वाकई ये हजारों-लाखों करोड़ों के जो घोटाले होते हैं, क्या वाकई इतनी रकम का अस्तित्व होता है? सहज भाव से दिया गया मंत्री का जवाब सन्न कर देने वाला है। अस्पताल में अपने बेटे की लाश लेने पहुंचा निर्मल, वाला सीन काफी भावुक है। यहां इरफान को देख उनकी फिल्म ‘नेमसेक’ की याद आती है। इस पूरे कार्य को अंजाम देते समय उनके हाव-भाव और कार्यशैली कई बार ‘दि फ्यूजिटिव’ (1993) के हैरीसन फोर्ड सरीखी लगती है। अपने प्लाट या कहिये मूल स्वभाव से यह फिल्म नीरज पांडे की फिल्म ‘ए वेडनस्डे’ (2008) के काफी करीब लगती है।

कई बार लगता है कि कहीं ये इस फिल्म कोई सीक्वल तो नहीं। हालांकि इसमें ‘ए वेडनस्डे’ जैसा करारापन कई जगह गायब है। लेकिन ‘मदारी’ को देख उस डमरू की याद जरूर आती है तो एक मायने में तो ध्यान बांधने और मनोरंजन के काम आता है, लेकिन दूसरी नजर से देखें तो मदारी का डमरू जगाने के काम भी आता है। रोचक तथ्य है कि ‘ए वेडनस्डे’ और निशिकांत कामत की फिल्म ‘मुंबई मेरी जान’ साल 2008 में एक महीने के अंतराल पर रिलीज हुई थीं। दोनों फिल्मों का सरोकार लगभग एक समान था। हालांकि चर्चा और सफलता ‘ए वेडनस्डे’ को मिली थी।

फिल्म में कुछेक खामियां जरूर हैं, लेकिन इससे इसकी मूल भावना से मुंह नहीं फेरा जा सकता। न ही इसे पूरी तरह से खारिज किया जा सकता है। इस फिल्म की पंचलाइन है, श श श श… देश सो रहा है। अगर नहीं सो रहा, तो मदारी और उसके डमरू की जरूरत भी नहीं है। और अगर वाकई देश सो रहा है तो…

सितारे: इरफान खान, जिमी शेरगिल, विशेष बंसल, तुषार दल्वी
निर्देशक: निशिकांत कामत
निर्माता: इरफान खान, शैलेश सिंह, मदन पालीवाल, सुतापा सिकधर, शैलजा केजरीवाल
लेखक: शैलजा केजरीवाल, तुषार हीरानंदानी
संगीत: विशाल भारद्वाज, सनी बावरा, इंद्र बावरा
गीत: इरशाद कामिल
पटकथा-संवाद: रितेश शाह

 

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