कैंसर रोगियों में जीवित रहने की दर में इज़ाफ़ा

विशेषज्ञों ने पाया है कि फेफड़ों के कैंसर से पीड़ित लोग अब अधिक समय तक जीवित रह रहे हैं। पिछले पांच वर्षों में फेफड़े के कैंसर से सर्वाइवल की दर में 26 प्रतिशत का इज़ाफ़ा देखने को मिला है।

कैंसर रोगियों में जीवित रहने की दर में इज़ाफ़ा

दुनियाभर में फेफड़े का कैंसर सबसे घातक कैंसर है। अमरीका भी इस बीमारी के मामले में सरफेहरिस्त है। इस बीच राज्य दर राज्य कैंसर के मामलों की जांच करने वाली एक नई रिपोर्ट से पता चलता है कि अब अधिक लोग फेफड़ों के कैंसर के साथ लंबे समय तक जीवित रह रहे हैं।

इस बारे में अमरीकन लंग एसोसिएशन (एएलए) के अध्यक्ष और सीईओ हेरोल्ड विमर का कहना है- “अभी भी और काम किया जाना बाकी है, लेकिन मैं फेफड़ों के कैंसर की देखभाल के भविष्य के बारे में अविश्वसनीय रूप से आशावादी हूं क्योंकि दस्तावेजों से पता चला है कि फेफड़ों के कैंसर में जीवित रहने की दर में सुधार हुआ है।”

प्रारंभिक निदान से जीवित रहने की दर पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। लगभग 43 प्रतिशत मामलों का पता तब तक नहीं चल पाता जब तक बीमारी अंतिम चरण में न आ जाए। ऐसे में मरीज़ के जीवित रहने की दर केवल 9 प्रतिशत रह जाती है। रिपोर्ट के अनुसार, 20 प्रतिशत से अधिक मामले जानकारी की कमी, फेफड़ों के कैंसर से जुड़े बेतुकी मान्यताओं, उपचार की लागत आदि के कारण इलाज से वंचित रह जाते हैं।

लेकिन रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कैंसर परीक्षण, जिसे आणविक, जीनोमिक या आनुवंशिक परीक्षण के रूप में भी जाना जाता है, तक पहुंच अभी भी असमान है।

इसके अतिरिक्त, यहाँ केवल 15 राज्यों को कैंसर के लिए व्यापक बीमा कवरेज की सुविधा मिल सकी है जबकिअन्य पांच राज्यों को कवर करने के लिए कुछ बीमा योजनाओं की आवश्यकता बनी हुई है।

बावजूद “फेफड़ों के कैंसर की स्थिति” पर रिपोर्ट सकारात्मक खबर पेश करती है। राष्ट्रीय स्तर पर पिछले पांच वर्षों में फेफड़ों के कैंसर से बचने की दर में 26 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जिसका कारण बढ़ती जागरूकता और पहचान और उपचार में प्रगति है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में फेफड़ों के कैंसर से बचने की दर में 26% का सुधार हुआ है।

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