रिश्वतखोरी के मामलों में विधानसभा के सदस्यों की छूट समाप्त

सुप्रीम कोर्ट ने सांसदों और विधायकों के विशेषाधिकार से जुड़े केस में अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट की सात जजों की बेंच ने फ़ैसला सुनाते हुए कहा है कि संसद, विधानमंडल में भाषण या वोट के लिए रिश्वत लेना सदन के विशेषाधिकार के दायरे में नहीं आएगा।

रिश्वतखोरी के मामलों में विधानसभा के सदस्यों की छूट समाप्त

एक ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने विधानसभा के सदस्यों से रिश्वत लेने के लिए आपराधिक कार्यवाही से छूट हटा दी।


ऐसे में अब अगर सांसद या विधायक रिश्वत लेकर सदन में भाषण देते हैं या वोट देते हैं तो उन पर कोर्ट में आपराधिक मामला चलाया जा सकता है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 1993 में झारखंड मुक्ति मोर्चा पार्टी के सदस्यों पर नरसिम्हा राव सरकार का समर्थन करने के लिए रिश्वत लेने का आरोप लगाया गया और मामला अदालत तक पहुंच गया।


सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा कि रिश्वतखोरी संसदीय विशेषाधिकारों द्वारा संरक्षित नहीं है। 1998 के फैसले की व्याख्या संविधान के अनुच्छेद 105, 194 के खिलाफ है।


मामले की जांच करते हुए 1998 में नरसिम्हा राव बनाम राज्य मामले में अदालत ने विधायकों को संसद में बोलने या वोट देने के बदले रिश्वत लेने के मामले में जांच से छूट दे दी।

हालाँकि, सर्वोच्च न्यायालय की सात न्यायाधीशों की पीठ ने 1998 के फैसले को रद्द करते हुए कहा कि विधानसभा के सदस्यों का भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी संसदीय लोकतंत्र को नष्ट कर देती है।

मामले की पृष्ठभूमि
झामुमो सदस्य और झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन और पार्टी के 4 अन्य विधायकों ने 1993 में नरसिम्हा राव के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव के खिलाफ वोट करने के लिए रिश्वत ली, जिससे नरसिम्हा राव की सरकार बच गई।

अविश्वास प्रस्ताव लाने वाली विपक्षी पार्टी ने चारों विधायकों पर रिश्वत लेने का आरोप लगाया था, जिस पर सीबीआई ने सोरेन और झामुमो के चार अन्य लोकसभा सांसदों के खिलाफ मामला दर्ज किया था।

हालाँकि, 1998 में, तत्कालीन सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सांसदों और विधायकों को विधानमंडल में बोलने या मतदान करने के लिए रिश्वत लेने के लिए संविधान के अनुच्छेद 105(2) और अनुच्छेद 194(2) के तहत छूट प्रदान की थी।

बाद में, 2012 में झारखंड में राज्यसभा चुनाव में एक उम्मीदवार को वोट देने के लिए रिश्वत देने का मामला सामने आया और विधायक सीता सोरेन ने 1998 के फैसले के तहत छूट की गुहार लगाई।

हालांकि, 2014 में झारखंड हाई कोर्ट ने अपने फैसले में विधानसभा सदस्य के खिलाफ वोट के लिए रिश्वत लेने के दर्ज आपराधिक मामले में छूट देने से इनकार कर दिया था। जिस पर विधानसभा सदस्य ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

7 मार्च, 2019 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता में तीन न्यायाधीशों के सुप्रीम कोर्ट पैनल ने उठाए गए सवाल के महत्वपूर्ण निहितार्थ के कारण मामले को एक बड़ी पीठ को भेज दिया।

अदालत ने कहा था कि अनिश्चितता और सार्वजनिक महत्व को देखते हुए इस मामले पर बड़ी पीठ द्वारा विचार करने की जरूरत है।

पिछले साल अक्टूबर में सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच ने मामले की सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। पीठ के अन्य न्यायाधीशों में जस्टिस एएस बोपन्ना, एमएम सुंदरेश, पीएस नरसिम्हा, जेबी पारदीवाला, संजय कुमार और मनोज मिश्रा शामिल थे।

सुप्रीम कोर्ट ने एक सुरक्षित फैसला सुनाते हुए कहा कि संसद में किसी को वोट देने या किसी मामले पर बोलने के लिए रिश्वत लेने पर विधानसभा सदस्य को आपराधिक मुकदमे से छूट है, जो असंवैधानिक और अवैध है। यानी अब अगर सांसद या विधायक रिश्वत लेकर सदन में भाषण देते हैं या वोट देते हैं तो उन पर कोर्ट में आपराधिक मामला चलाया जा सकता है।

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