काला धन लोकतंत्र को खोखला करता है। जब बाहरी प्रभावों से वोटरों की पसंद प्रभावित होती है, तो वह उनकी अपनी मर्जी नहीं रह जाती, बल्कि किसी और की पसंद उन पर थोप दी जाती है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस तरह के विचार सोमवार को व्यक्त किए गए।
शीर्ष अदालत ने इस जोर देते हुए यह बात कही कि चुनावी प्रक्रिया में गैर-कानूनी पैसे के प्रयोग से कानून के शासन और चुनावों की निष्पक्षता कमजोर होती है। इसके साथ ही अदालत ने चुनावों के दौरान गैर-कानूनी तरीके से कमाए गए पैसे की बरामदगी से जुड़े आपराधिक मामलों की समय पर जांच के अलावा उन्हें जल्द निपटाने पर ज़ोर दिया।
जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह और जस्टिस संजय करोल की बेंच ने ये निर्देश कर्नाटक हाई कोर्ट के 2015 के एक आदेश के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई के दौरान दिए। हाईकोर्ट के उस आदेश में प्रतीक पारसरामपुरिया के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया गया था।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, बेंच का कहना था कि हर व्यक्ति का एक वोट, नीतियों के एक खास सेट के लिए दिखाए गए समर्थन को दर्शाता है। ऐसे में अपनी बात कहे जाने का एकमात्र विकल्प ही दूषित हो जाए तो लोकतंत्र की मूल भावना यानी लोगों का, लोगों के द्वारा और लोगों के लिए शासन ही खतरे में पड़ जाता है।
बेंच ने स्पष्ट करते हुए कहा कि यह किसी और की पसंद होती है जो उन पर थोपी जा रही होती है। बेंच ने आगे कहा कि ये बाहरी कारक कई तरह के हो सकते हैं और इनमें से लगभग सभी के लिए शायद शांति और संतोष को छोड़कर, जो इस दुनिया में बाकी चीज़ों से अलग हैं, पैसे की जरूरत होती है।
बेंच ने यह भी कहा कि चुनावी प्रक्रिया में काला धन एक ऐसा पहलू है जो लोकतंत्र, कानून के शासन और खुद चुनावी प्रक्रिया को कमज़ोर करता है। बेंच ने चुनावी प्रक्रिया में काले धन के इस्तेमाल पर रोक लगाने को भारत के चुनाव आयोग की ज़िम्मेदारियों में से एक बताया।
रिपोर्ट्स के अनुसार बेंच ने यह भी कहा कि चुनाव के दौरान अपराधों पर मुकदमा चलाना राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है, इसलिए राज्य में सरकार बदलने पर एकतरफा तरीके से केस वापस लेना एक समस्या वाली सच्चाई है।
ईटीवी की एक रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयोग के आंकड़े कि साल 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान 3,87,430 एफआईआर दर्ज की गई थीं, जिनमें से सिर्फ 1,66,044 मामलों में ही सजा हुई। यह संख्या 42.9 फीसदी होती है। बाकी मामलों में अभी भी ट्रायल या जांच की बात सामने आई है।
बेंच ने निर्देश जारी करते हुए कहा कि जब कैश या दूसरी संपत्ति जब्त किए जाने पर अथॉरिटी को 24 घंटे के अंदर इसकी जानकारी जिला मजिस्ट्रेट/अतिरिक्त ज़िला मजिस्ट्रेट/सही अधिकार-क्षेत्र वाली अदालत को देनी होगी। साथ ही जब्त किए गए कैश या संपत्ति और संदिग्ध चुनावी अपराध के बीच शुरुआती संबंध बताते हुए लिखित कारण भी देने होंगे।
साथ ही बेंच ने एफआईआर दर्ज होने पर जांच की जिम्मेदारी संभालने वाले जांच अधिकारी को एफआईआर दर्ज होने की तिथि से एक वर्ष के भीतर जांच पूरी करने की हर संभव कोशिश करने की बात भी कही। बेंच ने यह भी कहा कि यदि यह समय-सीमा पार हो जाती है तो इसके कारण दर्ज किए जाएंगे और चुनाव आयोग को बताए जाएंगे।
बेंच ने यह भी कहा कि संबंधित जिले के सीनियर सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस/डिप्टी कमिश्नर ऑफ़ पुलिस की मंज़ूरी के बाद, आईओ नोडल ऑफिसर के जरिए चुनाव आयोग को जांच के बारे में तिमाही स्टेटस रिपोर्ट सौंपेगा. बेंच ने कहा कि जब स्टैटिक सर्विलांस टीमें (SST) चेकिंग के दौरान 10 लाख रुपये से ज़्यादा कैश पाती हैं, तो इसकी जानकारी इनकम टैक्स अधिकारियों को दी जानी चाहिए. चुनावों के बार-बार होने को ध्यान में रखते हुए, उम्मीदवारों/मौजूदा सांसदों/विधायकों के खिलाफ मामलों को तेजी से निपटाने की हर संभव कोशिश की जानी चाहिए.
इसके लिए निर्देश दिया जाता है कि हाईकोर्ट अपनी-अपनी प्रक्रियाओं का पालन करते हुए, ऐसे मामलों की जल्द सुनवाई और निपटारे के लिए विशेष कोर्ट तय कर सकते हैं,’ बेंच ने कहा. ‘चुनाव आयोग के हलफनामे में लोकसभा (2024) और विधानसभा चुनावों (2019-25) से जुड़े लंबित मामलों की जानकारी दी गई है, जिससे पता चलता है कि लंबित मामलों का प्रतिशत काफी ज़्यादा है. संबंधित कोर्ट को इन मामलों को जल्द से जल्द तार्किक नतीजे तक पहुँचाने की पूरी कोशिश करनी चाहिए,’ बेंच ने आगे कहा.
पारसरामपुरिया बेल्लारी से 2014 के लोकसभा उपचुनाव में उम्मीदवार थे और उन पर आरोप था कि उन्होंने वोटरों को रिश्वत देने के लिए भारी मात्रा में नकदी जमा की थी। हाईकोर्ट ने इस आधार पर एफआईआर रद्द कर दी कि शिकायत में यह नहीं बताया गया था कि आरोपी किसे रिश्वत देना चाहता था या उसने रिश्वत देने का क्या तरीका सोचा था।
अपील पर सुनवाई करते हुए बेंच ने चुनावों में काले धन के बड़े और व्यवस्थित मुद्दे की जांच करने के लिए कार्यवाही का दायरा बढ़ा दिया। बेंच ने कहा, ‘चुनाव आयोग और संबंधित राज्य सरकारें इन निर्देशों के पालन की रिपोर्ट 18 नवंबर, 2026 या उससे पहले दाखिल करें। ‘