जलवायु परिवर्तन ने किस तरह नेस्तनाबूद कर दी सिंधु घाटी सभ्यता- अध्ययन

जलवायु परिवर्तन की समस्या जितनी गंभीर है उसे उतनी गंभीरता से लिया नहीं जाता। हर दिन बढ़ता जलवायु परिवर्तन का खतरा किसी न किसी माध्यम से चेतावनी दे रहा है। कभी भीषण गर्मी के रूप में, कभी पिघलते ग्लेशियर की शक्ल में और कभी बेतहाशा बारिश, तूफ़ान और लैंड स्लाइडिंग के रूप में।

जलवायु परिवर्तन ने किस तरह नेस्तनाबूद कर दी सिंधु घाटी सभ्यता- अध्ययन

इस बीच आने वाली एक नई रिसर्च रिपोर्ट बताती है कि सिंधु घाटी जैसी महान सभ्यता के विनाश का कारण जलवायु परिवर्तन था। शोध के नतीजे बताते हैं कि किस तरह प्राचीन जलवायु प्रणालियों ने मानव बस्तियों और सभ्यता को प्रभावित किया।


इस शोध के ज़रिए न केवल सिंधु घाटी के सामने आने वाली पर्यावरणीय चुनौतियों की जानकारी मिलती है बल्कि मानव समाज पर जलवायु परिवर्तन के स्थायी प्रभाव का भी खुलासा होता है।


सिंधु घाटी सभ्यता के पतन पर किए गए शोध में यह महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ ट्रॉपिकल मेट्रोलॉजी यानी IITM के शोधकर्ताओं का मानना है कि चार हज़ार साल से भी पहले सिंधु घाटी सभ्यता के पतन की वजह जलवायु में उतार-चढ़ाव था।

क्वाटरनेरी इंटरनैशनल में प्रकाशित रिसर्च रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि लंबे समय तक सूखे की स्थिति बरक़रार रहने के कारण सिंधु घाटी सभ्यता में मानसून प्रणाली कमजोर हुई। इसके नतीजे में सूखे के हालात बने रहे।

दक्षिण भारत के कडप्पा और गुप्तेश्वर गुफाओं से प्राप्त स्पेलियोथेम्स यानी प्राचीन गुफा संरचनाओं के मिले साक्ष्य इन परिस्थितियों की मिसाल देते है। इन गुफाओं से मिलने वाले साक्ष्य बताते हैं कि लंबे समय तक सूखे के कारण मानसून प्रणाली कमजोर हो गई थी।

वर्तमान में भी मानसून परिवर्तन के पीछे जलवायु कारक के बड़ा कारण है। रिपोर्ट में भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान के शोधकर्ताओं का मानना है कि चार हज़ार साल पहले सिंधु घाटी सभ्यता का पतन, जलवायु में उतार-चढ़ाव के कारण हुआ था।

प्रायद्वीपीय भारत में गुफा की जांच के दौरान रिसर्च टीम ने सात हज़ार साल के क्लाइमेट रिकॉर्ड का जायज़ा लिया। ऐसा करने से इस इलाक़े में पिछले जलवायु परिवर्तनों से जुड़ी विस्तृत जानकारी मिली।

रिसर्च टीम ने पाया कि लगभग 4,200 साल पहले कम सौर विकिरण, अल नीनो की बढ़ती घटनाएं, इंटरट्रॉपिकल कन्वर्जेंस जोन (ITCZ) का दक्षिण की ओर पलायन, और हिंद महासागर डिपोल (IOD) का एक नकारात्मक चरण, मानसून पैटर्न को कमजोर करने में मददगार हुए।

शोध दल ने निष्कर्ष निकाला कि कमजोर मानसून ही संभवतः सिंधु घाटी सभ्यता के पतन का कारण बना। परिणामस्वरूप हड़प्पा और मोहन जोदड़ो जैसे प्रमुख शहरी केंद्र के साथ-साथ धोलावीरा, लोथल और राखीगढ़ी जैसी बस्तियां भी समाप्त हो गईं।

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