कॉप30: धरती की ठंडक बनाए रखने की क़वायद

पृथ्वी के बढ़ते तापमान को रोकने की दिशा में दौड़ भी तेज होती जा रही है। इसके लिए ब्राज़ील के बेलेम शहर में यूएन के वार्षिक जलवायु सम्मेलन, कॉप30 में दुनियाभर के पर्यावरण प्रतिनिधि जमा हुए हैं।

कॉप30: धरती की ठंडक बनाए रखने की क़वायद

इन प्रतिनिधियों का ध्यान ऐसे समाधानों पर केन्द्रित है, जिनमें कृत्रिम बुद्धिमता (एआई) और अत्याधुनिक शीतलन प्रणालियों (cooling systems) जैसे शक्तिशाली उपायों को साथ लेकर चला जाए और जलवायु संकट को और गम्भीर होने से भी रोका जाए।

इस बीच, संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP), कॉप30 सम्मेलन अध्यक्ष देश ब्राज़ील, और साझेदार संगठनों ने बढ़ते ताप से निजात पाने के लिए, Beat the Heat, नामक एक पहल को पेश किया है।

यूएन पर्यावरण कार्यक्रम की रिपोर्ट, Global Cooling Watch 2025, में आगाह किया गया है कि यदि मौजूदा रुझान यूं ही जारी रहे तो इस सदी के मध्य तक, 7.2 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड के समतुल्य उत्सर्जन हो सकता है।

हम जानते हैं कि एआई के ज़रिए किसानों को सूखे का समय रहते अनुमान लगाने, अपनी फ़सलों की बेहतर ढंग से देखरेख करने में मदद मिल रही है। लेकिन ऐसी टैक्नॉलॉजी के लिए ‘लार्ज लैंग्वेज मॉडल’ (LLM) तैयार किए जाते हैं, और विशाल डेटा केन्द्र भी स्थापित किए गए हैं, जिनमें बिजली की अपार खपत होती है। और यह चिन्ता की एक बड़ी वजह है।

दूसरी तरफ मकानों व इमारतों को ठंडा करने के लिए इस्तेमाल में लाए जाने वाले कूलिंग सिस्टम को कभी विलास की वस्तु के रूप में देखा जाता था, मगर अब विश्व के अनेक हिस्सों में ये आम जीवन की ज़रूरत बन गए हैं।

ये सभी सिस्टम ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन की एक बेहद तेज़ी से बढ़ती वजह बन चुके हैं। हालाँकि इसके अनेक टिकाऊ विकल्प भी सामने आए हैं, जैसे कि कमरों को स्वाभाविक रूप से हवादार बनाना, सौर ऊर्जा से संचालित रेफ़्रिजरेटर का उपयोग करना, लेकिन इन समाधानों को व्यापक स्तर पर अभी नहीं अपनाया गया है।

इसके मद्देनज़र, कॉप30 सम्मेलन के दौरान ‘टैक्नॉलॉजी कार्यक्रम’ पर विशेष रूप से ज़ोर दिया जा रहा है, जोकि अब तक धीमी गति से ही आगे बढ़ा है। यह एक ऐसा ब्लूप्रिन्ट है, जिसके तहत जीवनरक्षक, नवाचारी समाधानों को उन लोगों तक पहुँचाना है, जिन्हें उसकी सबसे अधिक आवश्यकता है।

बौद्धिक सम्पदा नियमों, कमर्शियल पाबन्दियों, और पर्याप्त धनराशि की चुनौतियों के कारण विकासशील देशों को अभी इन टैक्नॉलॉजी का लाभ नहीं मिल पाया है।

एक अनुमान के अनुसार, तापमान वृद्धि, बढ़ती आबादी की वजह से वर्ष 2050 तक, ‘कूलिंग की मांग’ में तीन गुना वृद्धि हो सकती है। ऐसे में अगर ज़रूरी क़दम नहीं उठाए गए तो ठंडक देने वाले उपकरणों के इस्तेमाल से होने वाले उत्सर्जन में लगभग दोगुनी वृद्धि हो सकती है, जिससे पावर ग्रिड पर भार बढ़ेगा और जलवायु लक्ष्य पहुँच से दूर हो सकते हैं।

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