2050 तक सभी उपलब्ध एंटीबायोटिक दवाएं अपना असर खो देंगी- विशेषज्ञ

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एंटीबायोटिक प्रतिरोध (antibiotic resistance) को मानवता के लिए एक गंभीर वैश्विक समस्या के रूप में सूचीबद्ध किया है।

2050 तक सभी उपलब्ध एंटीबायोटिक दवाएं अपना असर खो देंगी- विशेषज्ञ

एक रिपोर्ट के अनुसार, रोगाणुरोधी प्रतिरोध (एएमआर) के कारण प्रतिवर्ष 1.3 मिलियन मौतें होती हैं। यह समस्या विकासशील देश में स्वास्थ्य प्रणाली और अर्थव्यवस्था के लिए भी एक बड़ी चुनौती बन गई है।

एंटीबायोटिक क्या है
एंटीबायोटिक्स की खोज 1928 में अलेक्जेंडर फ्लेमिंग ने की थी और इनका उपयोग बैक्टीरिया से होने वाली बीमारियों के इलाज के लिए किया जाता है। एक विशेष रासायनिक प्रक्रिया के माध्यम से यह शरीर में बैक्टीरिया की वृद्धि को रोकते या उन्हें पूरी तरह से खत्म कर देते हैं।

कैसे उत्पन्न होता है एंटीबायोटिक प्रतिरोध
एंटीबायोटिक्स रक्तप्रवाह द्वारा शरीर के विभिन्न भागों तक पहुंचते हैं, और संक्रमण पैदा करने वाले बैक्टीरिया के विकास को रोकते हैं। लेकिन यदि इन एंटीबायोटिक दवाओं का अनावश्यक या अनियमित रूप से उपयोग किया जाए, तो बैक्टीरिया उत्परिवर्तन के माध्यम से विशिष्ट आनुवंशिक परिवर्तन करके दवाओं के विरुद्ध अपनी रक्षा प्रणाली को मजबूत कर लेते हैं। ऐसे में बैक्टीरिया उस विशेष एंटीबायोटिक के प्रति प्रतिरोधी हो जाते हैं और दवा अपना असर खो देती है।

एंटीबायोटिक प्रतिरोध खतरनाक क्यों है
जब बैक्टीरिया किसी विशिष्ट पीढ़ी के एंटीबायोटिक्स के लिए प्रतिरोधी हो जाते हैं, तो वह दवा बेकार हो जाती है और इलाज मुश्किल जाती है। इस दशा में असर बनाने के लिए अगली पीढ़ी का एंटीबायोटिक निर्धारित किया जाता है। यह सिलसिला ऐसे ही चलता रहता है। विशेषज्ञों के अनुसार भी, 2050 तक इंसान सभी उपलब्ध एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति बेअसर हो जाएंगे। यह न केवल एक प्रमुख चिकित्सा समस्या है, बल्कि वैश्विक स्तर पर एक गंभीर आर्थिक मुद्दा भी है।

एंटीबायोटिक प्रतिरोध की वैश्विक गंभीरता को ध्यान में रखते हुए हर वर्ष 18 से 24 नवंबर तक एंटीबायोटिक प्रतिरोध जागरूकता सप्ताह मनाया जाता है। अब जरूरत इस बात की है कि आम जनता में इस बारे में जागरूकता फैलाई जाए कि बीमारी का सटीक और समय पर निदान होने के बाद ही दवाओं का उपयोग किया जाना चाहिए।

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