सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर ऑस्ट्रेलिया में एक नया क़ानून लागू हुआ। इस क़ानून के तहत 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट पर पाबंदी लगा दी गई है। इस बीच, संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) ने आगाह किया है कि केवल आयु-सम्बन्धी पाबन्दियों को अपनाए जाने से ही बच्चों की सुरक्षा नहीं की जा सकती है।

यूनीसेफ़ ने अपने वक्तव्य में कहा कि आयु सम्बन्धी पाबन्दियों को एक ऐसी व्यापक रणनीति का हिस्सा बनाना होगा, जो बच्चों को इन प्लैटफ़ॉर्म से होने वाले नुक़सान से बचाने, निजता व भागेदारी के अधिकार का सम्मान करने और उन्हें कम नियामन व सुरक्षा वाले प्लैटफ़ॉर्म से बचाने पर केन्द्रित हो।
इस पाबंदी के बाद ऑस्ट्रेलिया में लाखों किशोर बच्चे जब इस बुधवार की सोकर उठे तो उन्होंने पाया कि उनका सोशल मीडिया अकाउंट या तो ‘डिएक्टिवेट’ हो चुका था या फिर उनके लिए ‘लॉग इन’ कर पाना सम्भव नहीं था।
यूनिसेफ के अनुसार, सोशल मीडिया प्लैटफ़ॉर्म को नए सिरे से डिज़ाइन किए जाने की आवश्यकता है और इसके लिए बाल सुरक्षा ज़रूरतों को ध्यान में रखना हो। इसके अलावा, नियामन एजेंसियों को ऐसे उपाय करने होंगे कि ऑनलाइन माध्यमों पर नुक़सान की रोकथाम की जा सके।
बच्चों के हक़ में यह क़दम उठाने वाला ऑस्ट्रेलिया पहला देश है, जिसका उद्देश्य कथित रूप से बच्चों को सोशल मीडिया प्लैटफ़ॉर्म के नकारात्मक प्रभावों, जैसेकि साइबर माध्यमों पर डराना-धमकाना, शोषण और हानिकारक सामग्री समेत अन्य कठिनाइयों से बचाना है।
समाचार माध्यमों के अनुसार, इस पाबन्दी से यूट्यूब, इन्स्टाग्राम, टिकटॉक, स्नैपचैट, एक्स समेत अन्य प्लैटफ़ॉर्म पर असर हुआ है। ऐसी ख़बरें हैं कि अन्य देश भी ऐसे क़दम उठाने पर विचार कर रहे हैं।
यूनीसेफ़ ने बुधवार को जारी अपने वक्तव्य में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के प्रति बढ़ते संकल्प का स्वागत किया है। साथ ही, सचेत किया है कि सोशल मीडिया पर पाबन्दी अपने साथ जोखिमों को लेकर आती है और अक्सर इनका विपरीत असर भी हो सकता है।
पाबन्दी से इतर उपाय
यूएन एजेंसी ने ध्यान दिलाया कि बहुत से बच्चों के लिए सोशल मीडिया पढ़ने-लिखने, एक दूसरे से जुड़ने, खेलने और स्वयं को अभिव्यक्त करने की जीवनरेखा है, विशेष रूप से अलग-थलग या हाशिए पर रहने वाले बच्चों के लिए।
इसके अलावा, एक चिन्ता यह भी है कि अनेक बच्चे किसी न किसी तरह से सोशल मीडिया के इस्तेमाल का रास्ता ढूंढ लेंगे, उपकरणों को साझा करके या फिर कम नियामन वाले प्लैटफ़ॉर्म पर जाकर। यदि ऐसा हुआ तो फिर उनकी सुरक्षा सुनिश्चित कर पाना और कठिन हो जाएगा।
यूनीसेफ़ के अनुसार, बाल सुरक्षा में निवेश कर रहे प्लैटफ़ॉर्म का स्थान, किसी नियामन व्यवस्था को नहीं दे देना चाहिए। आयु सम्बन्धी पाबन्दियों वाले क़ानून, कम्पनियों द्वारा प्लैटफ़ॉर्म का बेहतर डिज़ाइन तैयार करने या सामग्री की देखरेख और नियंत्रण का विकल्प नहीं हो सकते हैं।
सुरक्षित इंटरनेट
संयुक्त राष्ट्र बाल कोष ने सरकारों, नियामन एजेंसियों और टैक कम्पनियों से एक साथ मिलकर प्रयास करने का आग्रह किया है, ताकि बच्चों व परिवारों के लिए सुरक्षित, समावेशी डिजिटल माध्यम तैयार किए जा सकें, जहाँ बच्चों के अधिकारों का सम्मान हो।
इसके लिए यह ज़रूरी होगा कि आयु-सम्बन्धी क़ानून और नियामन, कम्पनियों के लिए तयशुदा दायित्वों का स्थान न लें. उनकी यह ज़िम्मेदारी है कि प्लैटफ़ॉर्म का डिज़ाइन सुरक्षित हो और वहाँ उपलब्ध सामग्री की प्रभावी ढंग से समीक्षा की व्यवस्था हो।
इसके समानान्तर, अभिभावकों और देखभालकर्ताओं को भी ज़रूरी मदद दी जानी होगी ताकि उनकी डिजिटल साक्षरता में सुधार हो. इस प्रक्रिया में उनकी अहम भूमिका है, लेकिन फ़िलहाल उन्हें अपने बच्चों के लिए ऐसे प्लैटफ़ॉर्म की निगरानी के लिए कहा जा रहा है, जो उन्होंने तैयार नहीं किए हैं और न ही बड़ी संख्या में ऐप पर नज़र रख पाना सम्भव है।
